भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १८१ ) हस्तपादसमोपेतो दृश्यसे पुरुषाकृतिः । शीतेन भिद्यसे मूढ ! कथं न कुरुषे गृहम् ॥ ४२२ ॥” हाथ पैरसे युक्त हुए तुम पुरुषाकार दीखते हो और हे मूर्ख ! शीतसे भेदित होकर भी तू घर क्यों नहीं बनाता है ॥ ४२२ ॥” एतच्छ्रुत्वा तां वानरः सकोपमाह,-“अधमे ! कस्मात् न त्वं मौनव्रता भवसि । अहो ! धाष्टर्यमस्याः अद्य मामुपहसति !- यह सुन क्रोध कर वानर बोला,-“अधमे ! चुप क्यों नहीं होती, अहो ! इस- की ढीठता कि, मेरा उपहास करती है- सूचीमुखी दुराचारा रण्डा पण्डितवादिनी । नाशङ्कते प्रजल्पन्ती त त्किमेनां न हन्म्यहम् ॥ ४२३ ॥” सूचीमुखवाली दुराचार रण्डा वृथा अपनेको पंडित माननेवाली बकवाद करती हुई नहीं डरती । सो इसको मैं क्यों नहीं नष्ट करूं ॥ ४२३ ॥” एवं प्रलप्य तामाह,-“मुग्धे ! किं तव ममोपरि चिन्तया । उक्तंच- इस प्रकार जल्पना कर उससे बोला,-“मुग्धे ! मेरी चिन्तासे तुझे क्या, कहा है- वाच्यं श्रद्धासमेतस्य पृच्छतश्च विशेषतः । प्रोक्तं श्रद्धाविहीनस्य अरण्यरुदितोपमम् ॥ ४२४ ॥ श्रद्धासे युक्त पूछते मनुष्यसेही विशेष कर कहना चाहिये श्रद्धाहीनसे कहना वनमें रोनेकी समान है ॥ ४२४ ॥ तत् किं बहुना । तावत् कुलायस्थितया तया पुनरपि अभिहितः स तावत् तां शमीमारुह्य तस्याः कुलायं शतधा खण्डश अकरोत् । अतोऽहं ब्रवीमि “उपदेशो न दातव्यः” इति। सो बहुत कहनेसे क्या है जब कि, घोंसलेमें बैठी हुई उसने फिर कहा तब इसने शमी वृक्षपर चढकर उसके घोंसलेके सौ खण्डकर दिये । इससे मैं कहता हूँ कि, “जिस किसीको उपदेश न देना चाहिये” तन्मूर्ख ! शिक्षापितोऽपि न शिक्षितः त्वम् । अथवा न ते दोषोऽस्ति, यतः साधोः शिक्षा गुणाय सम्पद्यते न असाधोः । उक्तञ्च-

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