पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८२ ) पञ्चतन्त्रम् ! सो हे मूर्ख ! सिखाया हुआ भी तू न सीखा । अथवा तेरा दोष नहीं है साधुमें शिक्षा गुणके निमित्त होतीहै असाधुमें नहीं। कहाहै- किं करोत्येव पाण्डित्यमस्थाने विनियोजितम् । अन्धकारप्रतिच्छन्ने घटे दीप इवाहितः ॥ ४२५ ॥ अनुचित स्थानमें लगाई पंडिताई क्या कर सकतीहै जैसे अंधकारसे पूर्ण घडेके ऊपर धरा हुआ दीपक (उसके भीतरका अंधकार दूर नहीं कर सकता) ॥ ४२५ ॥ तद्व्यर्थपाण्डित्यमाश्रित्य मम वचनमशृण्वन् न आत्मनः शान्तिमपि वेत्सि, तन्नूनमपजातः त्वम् । उक्तञ्च- सो वृथा पांडित्यका आश्रय कर मेरे वचन न सुने न अपनी शान्तिको भी जाना सो अवश्यही तू विजातीयहै। कहा है- जातः पुत्रोऽनुजातश्च अतिजातस्तथैव च । अपजातश्च लोकेऽस्मिन्मन्तव्याः शास्त्रवेदिभिः ॥ ४२६ ॥ इस संसारमें शास्त्रके जाननेवाले जात, अनुजात, अतिजात और अपजात यह चार प्रकारके पुत्र कहते हैं ॥ ४२६ ॥ मातृतुल्यगुणो जातस्त्वनुजातः पितुः समः । अतिजातोऽधिकस्तस्मादपजातोऽधमाधमः ॥ ४२७ ॥ माताके तुल्य गुणवाला जात, पिताके तुल्य गुणवाला अनुजात, पितासे अधिक अतिजात और अपजात अधमाधम कहाता है ॥ ४२७ ॥ अप्यात्मनो विनाशं गणयति न खलः परव्यसनहृष्टः । प्रायो मस्तकनाशे समरमुखे नृत्यति कबन्धः ॥ ४२८ ॥ पराये दुःखसे प्रसन्न हुआ दुष्ट अपने नाशको नहीं गिनताहै प्रायः मस्तकके नाश होनेमेंभी कबन्ध समरमें नृत्य करता है॥ ४२८ ॥ अहो ! साधु चेदमुच्यते । अहो ! यह सत्य कहा है कि- धर्मबुद्धिः कुबुद्धिश्च द्वावेतौ विदितौ मम । पुत्रेण व्यर्थपाण्डित्यात्पिता धूमेन घातितः ॥ ४२९ ।