पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २०८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
दंष्ट्राविरहितः सर्पो मदहीनो यथा गजः । सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ १४ ॥ डाढसे रहित जैसे सर्प, मदसे हीन जैसे हाथी, इसी प्रकार दुर्गहीन राजा सबके वशीभूत हो जाताहै ॥ १४ ॥ तथाच- तैसेही- न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् । तत्कर्म सिध्यते राज्ञां दुर्गेणैकेन यद्रणे ॥ १५ ॥ न सहस्र हाथियोंसे न लाख घोड़ोंसे वह कार्य सिद्ध होता है जो युद्धमें एक किलेसे सिद्ध होताहै ॥ १५ ॥ शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो धनुर्धरः । तस्माद्दुर्गं प्रशंसन्ति नीतिशास्त्रविदो जनाः ॥ १६ ॥” किलेमें स्थित धनुषधारी एकही सौसे युद्धकर सकता है इस कारण नीति- शास्त्रके ज्ञाता दुर्गकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥” अथ चित्रग्रीवो बिलमासाद्य तारस्वरेण प्रोवाच-“भो भो मित्र हिरण्यक ! सत्वरमागच्छ । महती मे व्यसनावस्था वर्त्तते”। तच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि बिलदुर्गान्तर्गतः सन् प्रोवा- च,-“भोः ! को भवान् ? किमर्थमायातः ? किं कारणम् ? कीदृक् ते व्यसनावस्थानम् ? तत् कथ्यताम्”इति । तच्छ्रुत्वा चित्रग्रीव आह.-“भोः ! चित्रग्रीवो नाम कपोतराजोऽहं ते सुहृत् । तत् सत्वरमागच्छ गुरुतरं प्रयोजनमस्ति” । तत् आकर्ण्य पुलकिततनुः प्रहृष्टात्मा स्थिरमनाः त्वरमाणो नि- ष्क्रान्तः । अथवा साधु इदमुच्यते- तब चित्रग्रीव बिलके निकट जाय ऊंचे स्वरसे बोला,-“भो भो मित्र हिरण्यक ! शीघ्रआओ मुझे बड़ी कष्टकी अवस्था वर्तमान है” । यह सुनकर हिरण्यक भी बिलदुर्गमें प्राप्त हुआ ही बोला,-“भो आप कौन हो ? क्यों आये हो ? क्या कारण है ? कैसी तुमको विपत्ति है सो कहो”। यह सुनकर