भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (२०९) चित्रग्रीव बोला,-"भो ! चित्रग्रीव नामवाला कपोतोका राजा मैं तेरा सुहृद हू । सो शीघ्र आओ । मेरा बहुत बडा कार्य है"। यह सुनकर पुलका- यमान शरीर प्रसन्नात्मा स्थिर मन शीघ्रता करता हुआ निकला । अथवा यह अच्छा कहा है- सुहृदः स्नेहसम्पन्ना लोचनानन्ददायिनः । गृहे गृहवतां नित्यं नागच्छन्ति महात्मनाम् ॥ १७ ॥ सुहृत् (मित्र) स्नेहसे सम्पन्न नेत्रोके आनन्द देनेवाले महात्मा गृहस्थियोंके घरोमे नित्य नहीं आते हैं ॥ १७ ॥ आदित्यस्योदयं तात ताम्बूलं भारती कथा । इष्टा भार्या सुमित्रं च अपूर्वाणि दिने दिने ॥ १८ ॥ हे तात ! सूर्यका उदय, ताम्बूल, महाभारतकी कथा, इष्ट स्त्री, सुन्दर मित्र यह दिन दिन अपूर्वही होते हैं ॥ १८ ॥ सुहृदो भवने यस्य समागच्छन्ति नित्यशः । चित्ते च तस्य सौख्यस्य न किञ्चित्प्रतिमं सुखम् ॥ १९ ॥ जिसके घरमें नित्यही सुहृद् आते है उसके चित्तमे उसके बराबर और कुछ सुख नहीं है ॥ १९ ॥ अथ चित्रग्रीवं सपरिवारं पाशबद्धमालोक्य हिरण्यकः सविषादमिदमाह-“भोः किमेतत् ?” स आह-“भो ! जानन्नपि किं पृच्छसि ? उक्तञ्च यतः- तब चित्रग्रीवको परिवारसहित पाशमे बन्धा हुआ देखकर हिरण्यक विषाद- पूर्वक यह वचन बोला,-“भो ! यह क्या है ?” वह बोला,-“भो ! जानकर भी क्या पूछता है ? कहा है कि- यस्माच्च येन च यदा च यथा च यच्च यावच्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म । तस्माच्च तेन च तदा च तथा च तच्च तावच्च तत्र च कृतान्तवशादुपैति ॥ २० ॥ १४