भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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(२१२) पञ्चतन्त्रम् । सदाचारेषु भृत्येषु संसीदत्सु च यः प्रभुः । सुखी स्यान्नरकं याति परत्रेह च सीदति ॥ २६ ॥ जो प्रभु सदाचारवाले भृत्योंके दुःखी होनेमें सुखी होता है वह परलोकमें नरकको जाता और यहांभी दुःखी होता है ॥ २६ ॥ तच्छ्रुत्वा प्रहृष्टो हिरण्यकः प्राह-"भोः ! वेद्मि अहं राजधर्मम् । परं मया तव परीक्षा कृता । तत् सर्वेषां पूर्व पाशच्छेदं करिष्यामि । भवानपि अनेन विधिना बहुकपोतपरिवारो भविष्यति । उक्तञ्च- यह सुनकर प्रसन्न हो हिरण्यक बोला- "भो ! मैं राजधर्म जानता हूं परंतु मैंने तेरी परीक्षा की थी । सो पहले अन्य सबोंके पाश छेदन करूंगा, आपभी इस विधिसे बहुत कपोतके परिवारवाले होंगे । कहा है- कारुण्यं संविभागश्च यस्य भृत्येषु सर्वदा । सम्भवेत्स महीपालस्त्रैलोक्यस्यापि रक्षणे ॥ २७ ॥ जिसकी भृत्योंमें सदा करुणा समविभाग है वह राजा त्रिलोकीके रक्षण करनेमें भी समर्थ होता है ॥ २७ ॥ एवमुक्त्वा सर्वेषां पाशच्छेदं कृत्वा हिरण्यकःचित्रग्री- वमाह-"मित्र ! गम्यतामधुना स्वाश्रयं प्रति भूयोऽपि व्यसने प्राप्ते समागन्तव्यम्" । इति तान् संप्रेष्य पुन- रपि दुर्गं प्रविष्टः । चित्रग्रीवोऽपि सपरिवारः स्वाश्रयम गतत् । अथवा साधु इदमुच्यते- यह कह सबकेही पाश छेदन करके हिरण्यक चित्रग्रीवमे बोला-"मित्र ! अब अपने स्थानको पधारो फिरभी दुःखप्राप्तिमें आना," इस प्रकार उनको भेजकर अपने दुर्गमें प्रवेश करगया, चित्रग्रीवभी परिवारसहित अपने आश्रयको गया । अथवा यह सत्य कहा है- मित्रवान्साधयत्यर्थान्दुःसाध्यानपि वै यतः । तस्मान्मित्राणि कुर्वीत समानान्येव चात्मनः ॥ २८ ॥ मित्रवान् जिससे कि, कठिन कार्योंको साध लेते हैं इसकारण अपने समान मित्रोंको करना चाहिये ॥ २८ ॥