भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( २१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

का त्वया सह मम मैत्री तत् गम्यतां, मैत्री विरोधभावात् कथम् ? उक्तञ्च- ऐसा विचार वृक्षसे उतर कर बिलके द्वारे आय चित्रग्रीवकी समान शब्द करके हिरण्यकको बुलाता हुआ "आओ २ भो हिरण्यक ! आओ"। उस शब्दको सुनकर हिरण्यक विचार करने लगा "क्या और कोई कबूतर बंधा रहगया, जिससे मुझे बुलाता है"। और बोला-"भो ! आप कौन हो ?" । वह बोला-"मैं लघुपतनक नाम काकहूं" । यह सुन अन्तर लीन होकर हिर- ण्यक बोला-"भो ! इस स्थानसे बहुत शीघ्र गमन करो" काक बोला,-"बड़े कार्यकेलिये तुम्हारे पास आया हू, फिर मुझे दर्शन क्यों नहीं देते हो" । हिरण्यक बोला-"तुम्हारे साथ मिलनेसे मेरा कुछभी प्रयोजन नहीं है"। काक बोला,-"चित्रग्रीवका मैने तुमसे पाशमोक्षण देखा है उस कारण मुझको बड़ी प्रीति हुई है, सो कदाचित् मेरा बंधन होनेसे तुम्हारे निकटसे छुटकारा होगा, सो मेरे साथ मित्रता करो" । हिरण्यक बोला-"भो ! आश्चर्य है कि, तू मेरा भोजन करनेवाला और मैं तेरा भोज्य पदार्थ हूं । सो कैसी तुम्हारे साथ मेरी मित्रता ? सो जाओ विरोधभावसे मित्रता कैसी ? कहा है- ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् । तयोर्मैत्री विवाहश्च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ ३० ॥ जिनका समान धन, जिनका समान कुलहो उन्हीकी मित्रता और विवाह होना उचित है विरुद्धका नहीं ॥ ३० ॥ तथाच- और देखो- यो मित्रं कुरुते मूढ आत्मनोऽसदृशं कुधीः । हीनं वाप्यधिकं वापि हास्यतां यात्यसौ जनः ॥ ३१ ॥ जो मूढ कुबुद्धि अपने असदृश मित्रोंको करता है हीन वा अधिक करता: है वह हास्यताको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ · तत् गम्यताम्"इति । वायस आह,-"भो हिरण्यक ! एषोऽहं तव दुर्गद्वारे उपविष्टः । यदि त्वं मैत्रीं न करोषि ततोऽहं प्राणमोक्षणं तवाग्रे करिष्यामि । अथवा प्रायोपवे-

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