भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम्। (२१७) अथवा मैं गुणवान्‌हूं मुझको वैर यातना कुछ नहीं करेगी यह सम्भावना न करनी। कहा है- सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिनेः मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम् । छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिंगलम् अज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः ॥३६॥” सिंहने व्याकरणके निर्माता पाणिनीके प्रिय प्राणोंको नष्ट किया और मीमां- साके बनानेवाले जैमिनि मुनिको सहसा हाथीने मार डाला और छन्दःशास्त्रके ज्ञाता पिंगलक ऋषिको सागरके किनारे नाकेने निगल लिया, अज्ञानसे आवृ- तचित्त अति क्रोधी कीटादिको गुणोंसे क्या प्रयोजन है ॥ ३६ ॥” वायस आह,-“अस्त्येतत तथापि श्रूयताम् । काक बोला,-यह तो योंही है तथापि सुनो- उपकाराच्च लोकानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् । भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां मैत्री स्याद्दर्शनात्सताम् ॥ ३७ ॥ उपकारसे लोकोंकी निमित्तसे मृगपक्षियोंकी, भय और लोभसे मूर्खोंकी और दर्शन करतेही सत्पुरुषोंकी मित्रता होती है ॥ ३७ ॥ मृद्घट इव सुखभेद्यो दुःसन्धानश्च दुर्जनो भवति । सुजनस्तु कनकघट इव दुर्भेद्यः सुकरसन्धिश्च ॥ ३८ ॥ मट्टीके घटकी समान सुखसे तोडने योग्य और फिर जुडनेके अयोग्य दुर्जन होता है सुजन सोनेके घडेकी समान दुर्भेद्य और शीघ्र जुड जानेवाला हो- ता है ॥ ३८ ॥ इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि यथा रसविशेषः । तद्वत्सज्जनमैत्री विपरीतानान्तु विपरीता ॥ ३९ ॥ ईखके अग्रभागमें क्रमसे जैसे रसविशेष होता जाता है इसी प्रकार सुजनों- की मित्रता होती है दुर्जनोंकी इसके विपरीत होती है ॥ ३९ ॥ तथाच- तैसेही- आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् ।