भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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(२१८) पञ्चतन्त्रम् । दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ॥ ४० ॥ प्रारम्भमें बहुत फिर क्रमसे न्यून, पहले थोडी क्रमसे बढती हुई दिनके पूर्वार्द्ध और परार्धसे भिन्न हुई छायाकी समान दुष्ट और भलोंकी मित्रता होती है॥४०॥ तत् साधुरहमपरं त्वां शपथादिभिर्निर्भयं करिष्यामि” । स आह,-“न मे अस्ति ते शपथैः प्रत्ययः । उक्तञ्च- सो मै साधु हूं और तुझको शपथादिसे निर्भय करूंगा" वह बोला,- "मुझे शपथका विश्वास नहीं है। कहाहै- शपथैः सन्धितस्यापि न विश्वासं व्रजेद्विपोः । श्रूयते शपथं कृत्वा वृत्रः शक्रेण सूदतः ॥ ४१ ॥ शपथसे सन्धिका प्राप्त हुए शत्रुके विश्वासमें न जाय सुना जाता है कि, शपथ करकेभी इन्द्रने वृत्रासुरको मार डाला ॥ ४१ ॥ न विश्वासं विना शत्रुुर्देवानापि सिद्धयति । विश्वासात्त्रिदशेन्द्रेण दितेर्गर्भो विदारितः ॥ ४२ ॥ विश्वासके बिना शत्रु देवताओंकोभी सिद्ध नहीं होता है, विश्वाससेही इन्द्रने दितिका गर्भ नष्ट करादिया ॥ ४२ ॥ अन्यच्च- औरभी- बृहस्पतेरपि प्राज्ञस्तस्मान्नैवात्र विश्वसेत् । य इच्छेदात्मनो वृद्धिमायुष्यं च सुखानि च ॥ ४३ ॥ जो बुद्धिमान् अपनी बुद्धि, आयु और सुखकी इच्छा करे वह बृहस्पतिके विश्वासमेंभी न जाय ॥ ४३ ॥ तथाच- और देखो- सुसूक्ष्मेणापि रन्ध्रेण प्रविश्याभ्यन्तरं रिपुः । नाशयेच्च शनैः पश्चात्प्लवं सलिलपूरवत् ॥ ४४ ॥ शत्रु बहुत सूक्ष्ममार्गसे भीतर प्रवेश कर शनैः २ नाश करे जिस प्रकार जलका पूर शनैः २ भरकर नावको पूर्ण करता है ॥ ४४ ॥

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