पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( २६३ )
भोगरहितेन धनेन ? यतः तव भोजनाच्छादनाभ्यधिका प्राप्तिरपि नास्ति । उक्तञ्च- सो जबतक यह कौलिक जागकर उस मोहरोँकी गांठको देखता है तबतक रीती देखकर खेदसे विचारने लगा । “अहो यह क्या है ? बडे कष्टसे उपार्जन किया धन लीलासेही कहां गया । सो व्यर्थ श्रमवाला निर्धनी मैं किस प्रकारसे अपनी स्त्री और मित्रोको मुख दिखलाऊगा” । ऐसा निश्चय कर उसी स्थानके गया । वहा तीन वर्षमें पाचसौ अशरफी उत्पन्न कर फिरभी अपने स्थानको चला । जब कि, जाते हुए अर्धमार्गमें सूर्य अस्त हुए तब सुवर्णके नाश होनेके भयसे थककर भी वह न सोया और केवल घरमे मन लगाये शीघ्रतासे चला । तब दो पुरुष सामनेसे आते वार्ता करते उसने सुने । उनमेसे एक बोला-“भो प्रभो ! तुमने क्यो इसको पाचसौ सुवर्ण दिये । सो क्या तू नहीं जानता है कि, भोजनाच्छादनसे अधिक इसके भाग्यमे कुछ नहीं है” । वह बोला-“भो कर्मन् ! उद्योगियोँको मैं अवश्य देताहू । उसका परिणाम तुम्हारे अधीनहै । सो क्यों मेरा तिरस्कार करते हो” । यह सुनकर सोमिलक जबतक गाठको देखता है तबतक सुवर्ण नहीं पाया, तब तो परम दुःखको प्राप्त होकर विचारने लगा, “अहो धनहीन मेरे जीवनसे क्या है ? सो इस वटवृक्षमें अपनेको बाधकर प्राणत्यागन करू”। ऐसा विचार कुशकी रस्सी बनाय अपने कठमे पाश डाल शाखामे अपनेको बाध जबतक अपनेको छोडता है तबतक एक पुरुष आकाशमें स्थित हुआ यह बोला,-“भो भो सोमिलक ! इस प्रकारका साहस मत कर मैं तेरे धनका हरण करनेवाला । भोजनाच्छादनस अधिक एक कौडी भी तेरेपास नहीं रहने देता । सो अपने घरको जा, तुम्हारे साहससे मैं संतुष्ट हुआहूं । मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता सो कोई अभीष्ट वर माग,” सोमिलक बोला-“जो ऐसा है तो मुझको बहुत धन दो”। वह बोला,-“भोगरहित धनको लेकर क्या करेगा क्यों कि तुझको भोजनाच्छादनसे अधिक प्राप्ति नहीं है । कहा है- किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला । या च वेश्येव सामान्या पथिकैरुपभुज्यते ॥ १४४ ॥ उस सम्पत्तिसे क्या है जो पुत्रवधूकी समान केवल अभोग्य है जो साधा- रण वेश्याकी समान पथिकोंसे भोगी जाती है वही अच्छी है ॥ १४४ ॥ ”