भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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पर चढगया । हिरण्यक समीपवर्ती बिलमें प्रविष्ट हुआ । तब यह लुब्धक मृगके गमनसे दुःखीमुख व्यर्थश्रम होनेसे उस मन्थरकको मन्द मन्द स्थलमें जाता देखकर विचारने लगा । “यद्यपि विधाताने हरिणको हरण कर लिया है तथापि यह कूर्म भोजनके निमित्त प्राप्त हुआ है । सो आज इसीके मांससे हमारे कुटु- म्बकी आहारवृत्ति होगी” । ऐसा विचार उसको कुशोंसे बांधकर धनुषपर आरोपण कर कंधेपर रख घरकी ओरको चला । इसी समय उसको ले जाता हुआ देख हिरण्यक दुःखसे व्याकुल हो विलाप करने लगा । “भो ! बड़ा कष्ट आपदा— एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य । तावद्द्वितीयं समुपस्थितं मे छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ १९१ ॥ सागरकी समान जबतक एक दुःखके पारको प्राप्त नहीं होता हूं तबतक दूसरा मुझे उपस्थित हुवाहै विपत्तिमें अनर्थकी प्राप्ती बहुत करके होती है॥१९१॥ तावदस्खलितं यावत्सुखं याति समे पथि । स्खलिते च समुत्पन्ने विषमञ्च पदे पदे ॥ १९२ ॥ तभीतक नहीं गिरता है जबतक समान मार्गमें गमन करता है और पतन होनेमें पद पदमें विषम मार्गही उपस्थित होता है ॥ १९२ ॥ यन्नम्रं सरलञ्चापि तच्चापत्सु न सीदति । धनुर्मित्रं कलत्रं च दुर्लभं शुद्धवंशजम् ॥ १९३ ॥ जो नम्र और सरल है वह आपत्तिमें भी विकारको प्राप्त नहीं होता है, पवित्र कुल ( शुद्धवंश ) से उत्पन्न धनु, मित्र और स्त्री दुर्लभ हैं ( यह आपदा में भी विकृत नहीं होते ) ॥ १९३ ॥ न मातरि न दारेषु न सौदर्ये न चात्मजे । विश्रम्भस्तादृशः पुंसां यादृङ्मित्रे निरन्तरे ॥ १९४ ॥ माता, स्त्री, सगेभाई, पुत्रमें भी पुरुषका ऐसा विश्वास नहीं होता जैसा निरन्तर मित्रमें होता है ॥ १९४ ॥