भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( २८३ ) यदि तावत् कृतान्तेन मे धननाशो विहितः तन्मार्ग- श्रान्तस्य मे विश्रामभूतं मित्रं कस्मात् अपहृतम् ? अपरमपि मित्रं परं मन्थरकसमं न स्यात् । उक्तञ्च- जो दैवने मेरा धन नाश कर दिया है तो मार्गमें थके हुए मेरे विश्रामभूत मित्रको क्यों हरण किया? और भी मन्थरककी समान कोई दुसरा मित्र न होगा।कहा है- असम्पत्तौ परो लाभो गुह्यस्य कथनं तथा । आपद्विमोक्षणं चैव मित्रस्यैतत्फलत्रयम् ॥ १९५ ॥ निर्धनतामें धनका महान् लाभहै, गुह्य ( रहस्य ) बातका कथन और आपत्ति दूरकरना यहही मित्रताके तीन फलहैं ॥ १९५ ॥ तदस्य पश्चान्नान्यः सुहृत् मे।तत् किं मम उपरि अन- वरतं व्यसनशरैर्वर्षति हन्त विधिः ? यत आदौ ताव- द्वित्तनाश, ततः परिवारभ्रंशः, ततो देशत्यागः, ततो मित्रवियोग इति । अथवा स्वरूपमेतत् सर्वेषामेव जन्तूनां जीवितधर्मस्य । उक्तंच- सो इससे अधिक श्रेष्ठ मेरा और कोई मित्र नहीं है सो क्यो मेरे ऊपर निर- न्तर दुःखरूपी बाणोंकी वर्षा विधाता करताहै ? ( हन्त ) खेदहै । जो आदिमें धनका नाश, फिर परिवारभ्रंश, फिर देशत्याग, पीछे मित्रवियोग हुआ । अथवा सम्पूर्ण जन्तुओंको जीवित धर्मका यह लक्षणहीह । कहाहै- कायः सन्निहितांपायः सम्पदः क्षणभंगुराः । समागमाः सापगमाः सर्वेषामेव देहिनाम् ॥ १९६ ॥ शरीर क्षणमात्रमें विध्वंस होनेवाला है, सम्पत्ति क्षणमात्रमे नाश होनेवाली हैं, सम्पूर्ण देहधारियोंके संयोग वियोगवाले हैं ॥ १९६ ॥ तथाच- तैसेही- क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्णं धनक्षये दीव्यति जाठराग्निः । आपत्सु वैराणि समुल्लसन्ति छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ १९७ ॥