पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (२९९) यो रिपोरागमं श्रुत्वा भयसन्त्रस्तमानसः । स्वस्थानं सन्त्यजेत्तत्र न स भूयो वसेन्नरः ॥ ४६ ॥ जो शत्रु का आगमन सुनकर, भयसे सन्तस्तमन होकर अपने स्थानको त्याग न कर देता है वह वहा फिर नहीं बस सकता है ॥ ४६ ॥ दंष्ट्राविरहितः सर्पो मदहीनो यथा गजः । स्थानहीनस्तथा राजा गम्यः स्यात्सर्वजन्तुषु ॥ ४७ ॥ डाढसे हीन जैसे सर्प, मदसे हीन जैसे हाथी तैसेही स्थानभ्रष्ट राजा सब जन्तुओंके गम्य होता है ॥ ४७ ॥ निजस्थानस्थितोऽप्येकः शतं योद्धुं सहेन्नरः । शक्तानामपि शत्रूणां तस्मात्स्थानं न सन्त्यजेत् ॥ ४८ ॥ अपने स्थानमें स्थित हुआ एकही सौ समर्थ शत्रुओको युद्धमें सहन कर सकता है इस कारण अपना स्थान त्याग न करे ॥ ४८ ॥ तस्माद्दुर्गं दृढं कृत्वा सुभटासारसंयुतम् । प्राकारपरिखायुक्तं शस्त्रादिभिरलंकृतम् ॥ ४९ ॥ इस कारण किलेको दृढ अपने योधायों के बलसे सयुक्त पर कोटा खाईसे- युक्त शस्त्रादिसे अलकृत कर ॥ ४९ ॥ तिष्ठ मध्यगतो नित्यं युद्धाय कृतनिश्चयः । जीवन्सम्प्राप्स्यसि क्ष्मान्तं मृतो वा स्वर्गमेष्यसि ॥ ५० ॥ युद्धके निमित्त निश्चय करके उसके मध्यमें नित्यही स्थित हो जीनेसे सम्पूर्ण पृथ्वी की प्राप्ति और मरनेपर स्वर्ग प्राप्त होगा ॥ ५० ॥ अन्यच्च- औरभी- बलिनापि न बध्यन्ते लघवोऽप्येकसंश्रयाः । विपक्षेणापि मरुता यथैकस्थानवीरुधः ॥ ५१ ॥ कहा है कि, यदि लघु एकताको प्राप्त हो जावे तो बलवानसे नहीं बध सक्ते- जैसे प्रतिकूल वायुसे एक स्थानके वृक्ष ॥ ५१ ॥
- महानप्येकजो वृक्षो बलवान्सुप्रतिष्ठितः । प्रसह्य इव वातेन शक्यो धर्षयितुं यतः ॥ ५२ ॥