पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३०० ) पञ्चतन्त्रम् । महान् इकला वृक्ष बलवान् और प्रतिष्ठित हो उसको भी बलसे वायु सहसा घर्षण कर सकती है ॥ ५२ ॥ अथ ये संहता वृक्षाः सर्वतः सुप्रतिष्ठिताः । न ते शीघ्रेण वातेन हन्यन्ते ह्येकसंश्रयात् ॥ ५३ ॥ और जो मिले हुए वृक्ष सब ओरसे प्रतिष्ठित हैं उन्हे इकट्ठे होनेसे एक साथ वायु प्रहार नहीं कर सकती ॥ ५३ ॥ एवं मनुष्यमेकं च शौर्येणापि समन्वितम् । शक्यं द्विषन्तो मन्यन्ते हिंसन्ति च ततः परम् ॥ ५४ ॥ इसी प्रकार शूरतासे युक्त इकले मनुष्यको शत्रु तिरस्कारके योग्य मानते हैं और उसका वधभी करलेते हैं ॥ ५४ ॥ एवं प्रजीविमन्त्र इदमासनसंज्ञकम्” । एतसमाकर्ण्य चि- रञ्जीविनं प्राह,–“भद्र ! त्वमपि स्वाभिप्रायं वद?” । सोऽब्र- वीत्-‘देव ! षाड्गुण्यमध्ये मम संश्रयः सम्यक् प्रतिभाति । तत् तस्य अनुष्ठानं कार्य्यम् । उक्तञ्च– इस प्रकार प्रजीवीका यह मंत्र आसनसंज्ञक है”। यह सुनकर वह चिरं- जीवीसे बोला,-“भद्र ! तुम भी अपना अभिप्राय कहो” । वह बोला,-“देव! (सन्धी आदि ) छः गुणोंके बीचमें मुझे ( १) संश्रयही भला विदित होता है । सो उसकाही अनुष्ठान करना चाहिये । कहा है– असहायः समर्थोऽपि तेजस्वी किं करिष्यति । निर्वाते ज्वलितो वह्निः स्वयमेव प्रशाम्यति ॥ ५५ ॥ समर्थ तेजस्वी यदि असहाय हो तो क्या कर सकता है वातरहित स्थानमें प्रज्वलित अग्नि आपही शान्त हो जायगी ॥ ५५ ॥ सङ्गतिः श्रेयसी पुंसां स्वपक्षे च विशेषतः । तुषैरपि परिभ्रष्टा न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ॥ ५६ ॥ पुरुषोंको अपने पक्षकी संगति करनी विशेष कर कल्याणकारक है भूसेसे रहित हुए चावल उगनेको समर्थ नहीं होते ॥ ५६ ॥ १ बलवानसे अभियुक्त हो प्रवलका आश्रय करना ।