पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३०५ ) तीर्थशब्देन अयुक्तकर्माभिधीयते तद्यदि तेषां कुत्सितं भव- ति तत्स्वामिनोऽभिघाताय भवति । प्रधानं भवति तद्वृद्धये स्यादिति । तद्यथा- मन्त्री पुरोहितः सेनापतिर्युवराजो दौवा- रिकोऽन्तर्वासिकः प्रशासकः समाहर्तृसन्निधातृप्रदेष्टृज्ञापकाः साधनाध्यक्षो गजाध्यक्षः कोषाध्यक्षो दुर्गपालकरपालसी- मापालप्रोत्कटभृत्याः एषां भेदेन द्राक् रिपुः साध्यते स्वपक्षे च देवी जननी कंचुकी मालिकः शय्यापालकः स्पर्शाध्यक्षः सांवत्सरिको भिषग्जलवाहकः ताम्बूलवाहकः आचार्योऽ- ङ्गरक्षकः स्थानचिन्तकः छत्रधरो विलासिनी एषां वैरद्वारेण स्वपक्षे विघातः । तथा च- तीर्थशब्दसे शत्रुके जय करनेका उपायरूप कर्म जानना । सो यदि वह कर्म उनका कुत्सितहो तो स्वामीके नाशके निमित्त होताहै । प्रधान हो तो उसकी वृद्धिके निमित्त होता है । सो जैसे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, द्वारपाल, अन्त पुरचारी, शासनकर्ता, करसंग्रहकर्ता, सदा निकटवर्ती, प्रदेष्टा ( प्रदर्शक ), ज्ञापक ( सम्वादलेजानेवाला ), साधनाध्यक्ष ( सेनापति ), गजाध्यक्ष, खजांची, दुर्गरक्षक, कररक्षक, सीमापालक, प्रवल कर्मचारी इनके भेदसे शीघ्रही शत्रु वशीभूत होजाताहै। ओर अपने पक्षमें रानी, माता, कंचुकी, अन्त:पुरचारी वृद्ध, ( विप्रगुणोंसे युक्त ), मालाकार, सेजकी रक्षाकरनेवाला, स्पर्शाध्यक्ष ( सुगन्धि- लगानेवाला ), ज्योतिषी, वैद्य, पनिहारा, ताम्बूलदाता, गुरु, शरीररक्षक, स्थानके सद् असद्का ज्ञाता, छत्रधारण करनेवाला, वेश्या इनके वैरविरोधसे निजपक्षका घात होताहै । तथाच- वैद्यसांवत्सरिकाचार्याः स्वपक्षेऽधिकृताश्चराः । यथाहितुण्डिकोन्मत्ताः सर्वं जानन्ति शत्रुबु ॥ ६८ ॥ वैद्य, ज्योतिषी, गुरु, अपने पक्षके अधिकारी चर, आहितुण्डिकसे उन्मत्त विप्रवैद्य गूढचारी शत्रु का सब भेद जानतेहैं ॥ ६८ ॥ तथाच- तैसेही- २०