भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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(३०६) पञ्चतन्त्रम् ।

कृत्याकृत्यविदस्तीर्थेष्वन्तःप्रणिधयः पदम् । विदांकुर्वन्तु महतस्तलं विद्विषदम्भसः ॥ ६९ ॥” कार्यके जाननेवाले गूढचर उक्त मंत्रादि अठारह स्थानोंमें अन्तर पदकरके महान् शत्रुरूपी जलके तलको जाने ॥ ६९ ॥” एवं मन्त्रिवाक्यमाकर्ण्य अत्रान्तरे मेघवर्ण आह,-“तात! अथ किं निमित्तमेवंविधं प्राणान्तिकं सदैव वायसोलूकानां वैरम् ?” । स आह,-“वत्स ! कदाचित् हंसशुकवककोकि- लचातकोलूकमयूरकपोतपारावतविष्किरप्रभृतयः सर्वेऽपि पक्षिणः समेत्य सोद्वेगं मन्त्रयितुमारब्धाः । “अहो ! अस्माकं तावद्वैनतेयो राजा-स च वासुदेवभक्तः न कामपि चिन्तामस्माकं करोति । तद् किं तेन वृथा स्वामिना यो लुब्धकपाशैः नित्यं निबध्यमानानां न रक्षां विधत्ते। उक्तञ्च- इसप्रकार मंत्रिके वाक्यको सुनकर इसी समय मेघवर्ण बोला,-“तात ! किस निमित्त इसप्रकार प्राणहारी सदाका वायस उलूकोंका बैरहै ?” वह बोला,-“वत्स ! एक समय हंस, तोत, बगले, कोकिल, चातक, उलूक, मयूर, कपोत, पारावत, विष्किर (चिड़िया), आदि सब पक्षी मिलकर उद्वेग सहित सम्मति करने लगे “अहो ! हमारे गरुड़ राजाहैं, वह वासुदेवके भक्तहैं हमारी कुछभी चिन्ता नहीं करतेहैं, सो उस वृथा स्वामीसे क्याहै जो लुब्धकोंके जालसे नित्य बंधेहुए हमारी रक्षा नहीं करते । कहाहै- यो न रक्षति वित्रस्तान्पीड्यमानानपरैः सदा । जन्तून्पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः ॥ ७० ॥ जो शत्रुसे पीडित हुए भृत्योंकी रक्षा नहीं करताहै तथा भयभीत जनोंकी जो रक्षा नहीं करता इसमें सन्देह नहीं वह राजा कालरूपहै ॥ ७० ॥ यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजाः । अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ ७१ ॥ जो राजा भलीप्रकार शिक्षाकरनेवाला न हो तो प्रजा विना मल्लाहके साग- रमें नावकी समान पीडित होतीहै ॥ ७१ ॥

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