भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३१४ ) पञ्चतन्त्रम् । अहं लम्बकर्णो नाम शशकः चन्द्रमण्डले वसामि । साम्प्रतं भगवता चन्द्रमसा तव पार्श्वे प्रहितो दूतो जानाति एव भवान्, यथार्थवादिनो दूतस्य न दोषः करणीयः दूतमुखाः हि राजानः सर्व एव, उक्तञ्च- सो इस दुःखःसे अपना छुटकारा विचारा जावै” । तब और बोले,-“अहो ! यह तो सत्य है और कोई हमारे जीनेका उपाय नहीं है सो यही करो” । तब लम्बकर्ण हस्तियूथपतिके निकट जानेमें नियुक्त कियागया और गयाभी । तैसा करनेपर लम्बकर्णभी हाथीके मार्गको प्राप्त होकर दुर्गम स्थानमें चढकर उस हाथीसे बोला-“रे दुष्टगज ! क्यों इस प्रकार लीलासे निश्शंक हो इस चन्द्रहृदमें आता है सो अब मतआना लोटजा” यह सुन विस्मित मन हो हाथी बोला- “भो ! तू कौन है ?” वह बोला,-“मैं लम्बकर्ण नाम खरगोश चन्द्रमण्डलमें रहताहूं । इस समय भगवान् चन्द्रमाने तुम्हारे पास दूत बनाकर भेजा है सो तुम जानते हो । यथार्थवादी दूतका दोष नहीं होता है । सब राजा दूतमुखवाले होते हैं । कहा है- उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु बन्धुवर्गवधेष्वपि । परुषाण्यपि जल्‍पन्तो वध्या दूता न भूभुजा ॥ ८८ ॥” शस्त्रके उठानेपर, बन्धुवर्गके वध होनेपर, कठोर वाक्य कहते हुएभी दूतोंको राजा न मारे ॥ ८८ ॥” तत् श्रुत्वा स आह-“भोः शशक ! तत्कथय भगवतश्चन्द्र- मसः सन्देशं, येन सत्वरं क्रियते” । स आह-“भवता अती- तदिवसे यूथेन सह आगच्छता प्रभूताः शशका निपातिताः। तत् किं न वेत्ति भवान्, यत् मम परिग्रहोऽयम् ? तद्यदि जीवितेन ते प्रयोजनं तदा केनापि प्रयोजनेन अत्र हृदे न आगन्तव्यमिति सन्देशः”। गज आह-“अथ क्व वर्त्तते भग- वान् स्वामी चन्द्रः” । स आह “अत्र हृदे साम्प्रतं शशकानां भवद्यूथमथितानां हतशेषाणां समाश्वासनाय समायातः तिष्ठति । अहं पुनः तस्यान्तिकं प्रेषितः” । गज आह-“यदि एवं तद्दर्शय मे तं स्वामिनं येन प्रणम्य अन्यत्र गच्छामि”,