पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३१३ )
हिते श्रद्धेयवचनात् कदाचिन्निवर्त्तते "। अथ अन्ये प्रोचुः- " यदि एवं तदस्ति लम्बकर्णो नाम शशकः । स च वचन- रचनाचतुरो दूतकर्मज्ञः । स तत्र प्रेष्यताम् इति । उक्तञ्च- तब और बोला- " जो ऐसा है तो उनको महा विभीषिकाका स्थान है जिससे वह न आवेंगे वह भय चतुर दूतके आधीन है जो कि, विजयदत्त नामक राजा हमारा स्वामी खरगोश चन्द्रमण्डलमें निवास करता है । सो भेजो कोई मिथ्या- दूत यूथपतिके पास कि, " चन्द्रमा तुमको इस ह्रदमें आनेका निषेध करता है, जिस कारण कि, हमारे आश्रित इसके चारों ओर निवास करते हैं"। ऐसा कहनेपर श्रद्धावाले वचनसे कदाचित् निवृत्त हो जाय" । और बोले- " जो ऐसा है तो यहा लम्बकर्ण नामवाला खरगोश रहता है, वह वचनरचनामें चतुर दूतके कर्मका जाननेवाला है, इसीको वहा भेजो । कहा है- साकारो निःस्पृहो वाग्मी नानाशस्त्रविचक्षणः । परचित्तावमन्ता च राज्ञो दूतः स इष्यते ॥ ८६ ॥ सुन्दर, अवयवसम्पन्न, लोभरहित वाक्पटु नाना शास्त्रमें चतुर पराये चित्तकी बात जाननेवाला दूत राजाओंको करना चाहिये ॥ ८६ ॥ अन्यच्च- औरभी- यो मूर्खं लौल्यसम्पन्नं राजद्वारिकमाचरेत् । मिथ्यावादं विशेषेण तस्य कार्यं न सिद्ध्यति ॥ ८७ ॥ जो मूर्ख लुब्ध मिथ्यावादी दूतको करता है उसका कार्य सिद्ध नहीं होता ॥८७॥ तदन्विष्यतां यदि अस्माद्व्यसनादात्मनां सुनिर्मुक्तिः" । अथ अन्ये प्रोचुः, - " अहो ! युक्तमेतत् । न अन्यः कश्चिदु- पायोऽस्माकं जीवितस्य, तथा एव क्रियताम्"। अथ लम्बक- र्णो गजयूथाधिपसमीपे निरूपितो गतश्च । तथानुष्ठिते लम्ब- कर्णोऽपि गजमार्गमासाद्य अगम्यं स्थलमारुह्य तं गजमुवाच- "भो भो दुष्ट गज ! किमेवं लीलया निःशङ्कतया अत्र चन्द्र- ह्रदे आगच्छसि। तन्न आगन्तव्यं निवर्त्यताम्" इति। तदाकर्ण्य विस्मितमना गज आह- " भोः ! कस्त्वम् !" स आह-