पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें“कि-बहुत बुद्धिसे युक्त, विज्ञानवाले, बलसे उत्कट शत्रुके वञ्चन करनेमें समर्थ होजाते हैं जैसे ब्राह्मणसे छाग लेलिया ॥ १२१ ॥” अथवा साधु इदमुच्यते- अथवा यह साधु कहाहै कि- अभिनवसेवकविनयैः प्राघूर्णकोक्तैर्विलासिनिरुदितैः । धूर्त्तजनवचननिकरैरिह कश्चिदवञ्चितो नास्ति ॥ १२२ ॥ नये सेवकोंकी विनयसे, आगन्तुकके बचनोंसे, स्त्री जनोंके रोनेसे, धूर्त जनोंके वाक् प्रपञ्चसे इस जगतमें कौन नहीं वचित हुआ है ॥ १२२ ॥ किञ्च, दुर्बलैः अपि बहुभिः सह विरोधो न युक्तः। उक्तञ्च- किंच बहुत दुर्बलोंके साथभी विरोध करना उचित नहीं है । कहाहै- बहवो न विरोद्धव्या दुर्जया हि महाजनाः । स्फुरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥ १२३ ॥” कि बहुतोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये महाजन दुर्जय होते हैं क्यों कि चींटी तेजस्वी सर्पकोभी भक्षण करगई ॥ १२३ ॥” मेघवर्ण आह-“कथमेतत् ?” स्थिरजीवी कथयति- मेघवर्ण बोला-“यह कैसे ?” स्थिरजीवी कहने लगा- कथा ४. अस्ति कस्मिंश्चित् वल्मीके महाकायः कृष्णसर्पोऽतिदर्पो नाम । स कदाचित् बिलानुसारिमार्गमुत्सृज्य अन्येन लघु- द्वारेण निष्क्रमितुमारब्धः।निष्क्रामतश्च तस्य महाकायत्वात् दैववशतया लघुविवरत्वाच्च शरीरे व्रणः समुत्पन्नः । अथ व्रण- शोणितगन्धानुसारिणीभिः पिपीलिकाभिः सर्वतो व्याप्तो व्याकुलीकृतश्च । कति व्यापोदयति कति वा ताडयति। अथ प्रभूतत्वात् विस्तारितबहुव्रणः क्षतसर्वाङ्गोऽतिदर्पः पञ्च- त्वमुपागतः । अतोऽहं ब्रवीमि- किसी वल्मीकमें महा कायावाला काला साप अतिदर्प नामवाला है। वह एक समय बिलानुसारी मार्गको छोड़कर और लघुद्वारसे निकलने लगा । निकलते