भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (३४७) शीतवातातपसहः कृशाङ्गो मलिनस्तथा । उपवासैर्बहुविधैश्चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥ १७८ ॥ शीत वात गरमीका सहनेवाला कृश अंग मलीन मैं अनेक उपवास कर धर्म करूंगा ॥ १७८ ॥ ततो यष्टिं शलाकाञ्च जालकं पञ्जरं तथा । बभञ्ज लुब्धकोपीमां कपोतीञ्च मुमोचह ॥ १७९ ॥ तब वह लुब्धक लकडी शलाका जाल पाँजरा तोडकर उस दीन कपोतीको भी छोड देता हुआ ॥ १७९ ॥ लुब्धकेन ततो मुक्ता दृष्ट्वाग्नौ पतितं पतिम् । कपोती विललापार्त्ता शोकसन्तप्तमानसा ॥ १८० ॥ वह लुब्धकसे छोडी हुई कपोती अग्निमें पतिको गिरा देख शोक सन्ताप मनसे व्याकुल हो विलाप करने लगी ॥ १८० ॥ न कार्यमद्य मे नाथ जीवितेन त्वया विना । दीनायाः पतिहीनायाः किं नार्य्या जीविते फलम्॥१८१॥ हे नाथ ! तुम्हारे बिना मुझे जीनेसे अब काम नहीं है दीन पतिहीन स्त्रीके जीनेसे क्या फल है ? ॥ १८१ ॥ मनोदर्पस्त्वहङ्कारः कुलपूजा च बन्धुषु । दासभृत्यजनेष्वाज्ञा वैधव्येन प्रणश्यति ॥ १८२ ॥ मनका हर्ष, अहङ्कार, बन्धुओंमें कुल गौरव, दास तथा भृत्यजनोंमें आज्ञा यह सब वैधव्य होनेमें नष्ट होजाता है ॥ १८२ ॥ एवं विलप्य बहुशः कृपणं भृशदुःखिता । पतिव्रता सुसन्दीप्तं तमेवाग्निं विवेश सा ॥ १८३ ॥ इस प्रकार बहुत विलाप कर दीन दुखी हो वह पतिव्रता उस प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश कर गई ॥ १८३ ॥ ततो दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता । भर्त्तारं सा विमानस्थं ददर्श स्वं कपोतिका ॥ १८४ ॥ तब दिव्य वस्त्र पहरे दिव्य गहनोंसे भूषित वह कपोती विमानमें अपने स्वा- मीको देखने लगी ॥ १८४ ॥