भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३४८ ) पञ्चतन्त्रम् । सोऽपि दिव्यतनुर्भूत्वा यथार्थमिदमब्रवीत् । अहो मामनुगच्छन्त्या कृतं साधु शुभे त्वया ॥ १८५ ॥ और वह भी दिव्य शरीर हो यथार्थ ऐसा कहने लगा हे शुभे ! मेरे पीछे आई यह तुमने अच्छा किया ॥ १८५ ॥ तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटी च यानि रोमाणि मानुषे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्त्तारं यानुगच्छति ॥ १८६ ॥ साढेतीन करोड जितने रोम मनुष्यके हैं इतने समयतक वह स्त्री स्वर्गमें निवास करती है जो अपने स्वामीके पीछे अनुगमन करती है ॥ १८६ ॥ कपोतदेवः सूर्यास्ते प्रत्यहं सुखमन्वभूत् । कपोतदेहवत्सासीत्प्राक्पुण्यप्रभवं हि तत् ॥ १८७ ॥ वह कपोतदेव सूर्यास्तमें प्रतिदिन सुख अनुभव करता था और वह कपोती पूर्वजन्मके पुण्यप्रभावसे कपोत देहवत् होगई ॥ १८७ ॥ हर्षाविष्टस्ततो व्याधो विवेश च वनं घनम् । प्राणिहिंसां परित्यज्य बहुनिर्वेदवान्भृशम् ॥ १८८ ॥ तब प्रसन्न हो वह व्याधा गहन वनमें प्रवेश करगया । और प्राणीकी हिंसा त्यागन कर बहुत निर्वेदवाला होकर ॥ १८८ ॥ तत्र दावानलं दृष्ट्वा विवेश विरताशयः । निर्दग्धकल्मषो भूत्वा स्वर्गसौख्यमवाप्तवान् ॥ १८९ ॥ वहां दावानल लगी देखकर उसमें प्रवेश करगया और पापरहित होकर स्वर्गका सुख भोगने लगा ॥ १८९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि- इससे मैं कहता हूं- “श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः । पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ १९० ॥” “सुना है कि, कपोतने शरणमें आये शत्रुको यथायोग्य पूजन कर अपने मांससे निमंत्रित किया ॥ १९० ॥” तत श्रुत्वा अरिमर्दनो दीप्ताक्षं पृष्टवान्-“ एवमवस्थिते किं भवान् मन्यते?” सोऽब्रवीत,-“देव ! न हन्तव्य एवायम्।