पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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इसके संग विवाह करो”। ऐसा कह अपनी कन्यासे बोले-“पुत्रि ! क्या यह त्रिलोकीके प्रकाशक भगवान् सूर्य तुमको रुचते हैं?” । पुत्रिका बोली-“पित.! यह अधिक प्रज्वलित है। मैं इनकी अभिलाषा नहीं करती । सो इनसे अधिक उत्कृष्ट कोई बुलाओ” तब उसके यह वचन सुन मुनि सूर्यसे बोले-“भगवन् ! कोई तुमसे भी अधिक शक्तिमान् है ?” सूर्य बोले-“मुझसे भी अधिक मेघ है जिससे ढक कर मैं अदृश्य होता हूं ” । तब मुनिने मेघदेवताको बुलाकर कन्यासे कहा-“पुत्रिके ! इसके निमित्त तुझे दू ?” । वह बोली । “-यह कृष्णवर्ण जडात्मा है । सो इससे अधिक किसी प्रधानके निमित्त मुझे दो” । -तब मुनिने मेघसे पूछा-“भो मेघ ! तुझसे भी अधिक कोई है ?”। मेघने कहा मुझसे भी अधिक वायुहै वायुसे हत हुआ मैं सहस्रधा हो जाता हूं”। यह सुनकर मुनिने वायुको बुलाया । बोले भी-“पुत्रिके ! क्या यह वायु विवाहके निमित्त तुझे अच्छा लगता है ?” वह बोली-“तात ! यह अधिक चपल है । सो इससे अधिक कोई और बुलाओ”। मुनिने कहा-“वायो ! क्या कोई तुमसे भी अधिक है ?”। वायुने कहा-“मुझसे अधिक पर्वत है जिससे निश्चल होकर बल- वान् भी मैं धारित होता हूं” । तब मुनि पर्वतको बुलाकर कन्यासे बोले- “पुत्रिके ! तुमको इसके निमित्त दू ?” । वह बोली-“तात ! यह कठिनात्मा और निश्चल है, सो और किसीके निमित्त मुझे दो” । मुनिने पर्वतसे पूछा,- “भो पर्वतराज ! कोई तुमसे भी अधिक है ?”। पर्वतने कहा-“मुझसे अधिक मूषे हैं जो मेरे शरीरको बलसे विदीर्ण करते हैं”। तब मुनिने मुषकराजको बुलाय उसे दिखाया और बोले-“पुत्रिके ! क्या इसके निमित्त तुझे दू यह- मूषिकराज तुझको अच्छा लगता है ?” वह भी उसको देख यह स्वजातीय है ऐसा मानकर पुलकावलीसे अलंकृत शरीरवाली उससे बोली,-“तात ! मुझे मूषिका करके इसके निमित्त दो । जिससे अपनी जातिके योग्य गृहधर्मका अनु- ष्ठान करूं” । तब वह भी अपने तपोबलसे उसे मूषिका करके उस ( मूषक- राज ) को देते भये । इससे मैं कहता हू- सूर्य्यं भर्तारमुत्सृज्य पर्जन्यं मारुतं गिरिम् । स्वजातिं मूषिका प्राप्ता स्वजातिर्दुरतिक्रमा ॥ २२१ ॥” [Footer] २४