पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सुख भोगमें रत, फणावाले, वस्त्रधारी, केंचलीवाले, कुटिल (कपटी), टेढी गतिवाले, निष्ठुरचेष्टावाले, दुष्टराजा सर्पकी समान मन्त्र चित्तानुवृत्तिसेही साध्य होते हैं ॥ ६९ ॥ द्विजिह्वाः क्रूरकर्माणोऽनिष्टाश्छिद्रानुसारिणः । दूरतोऽपि हि पश्यन्ति राजानो भुजगा इव ॥ ७० ॥ दो जिह्वावाले, क्षण क्षणमे भिन्न बचन कहनेवाले, क्रूरकर्म करनेवाले, अनिष्ट (निष्पत्तिरहित) दोषके देखनेवाले, (बिलमें गमन करनेवाले) राजा सर्पोंकी समान दूरसेही देखते हैं ॥ ७० ॥ स्वल्पमप्यपकुर्वन्ति येऽभीष्टा हि महीपतेः । ते वह्नाविव दह्यन्ते पतङ्गाः पापचेतसः ॥ ७१ ॥ जो राजाके इष्टपुरुष उनका थोडाभी अनिष्ट करते हैं, वे पापचित्तवाले अग्निमें पतंगकी समान जलते हैं ॥ ७१ ॥ दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम् । स्वल्पेनाप्यपकारेण ब्राह्मण्यमिव दुष्यति ॥ ७२ ॥ सब लोकोंसे नमस्कार करनेके योग्य राजोंका पद दुरारोह (कठिनसे प्राप्त) है, थोडेसेभी अपकारसे ब्राह्मणत्वकी समान दूषित होजाता है ॥ ७२ ॥ दुराराध्याः श्रियो राज्ञां दुरापा दुष्परिग्रहाः । तिष्ठन्त्याप इवाधारे चिरमात्मनि संस्थिताः ॥ ७३ ॥” राजलक्ष्मी कठिनतासे सेवनीय होसक्ती है, इसी कारण दुर्लभ और प्राप्य होनेको अशक्य है, लक्ष्मी आधार (पात्र) में जलकी समान यत्नसे रक्षित की हुई चिरकालतक अपने पास रहती है ॥ ७३ ॥” 'दमनक आह- “सत्यमेतत्परं किन्तु- दमनक बोला,-“यह सत्य है किन्तु- यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन समाचरेत् । अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ७४ ॥ जिस जिसका जो जो भाव है; उस उस भावसे उसको सेवन करै, बुद्धिमान् उसमें प्रवेश कर शीघ्र अपने वशमे करै ॥ ७४ ॥ भर्तुश्चित्तानुवर्तित्वं सुवृत्तं चानुजीविनाम् । राक्षसाश्चापि गृह्यन्ते नित्यं छन्दानुवर्तिभिः ॥ ७५ ॥