भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

स्वामीके चित्तके अनुसार वर्तना अनुजीवियोंका सुशील है, निरन्तर उनके आशयके अनुसार चलनेवाले मनुष्य राक्षसोंकोभी वश करतेहै ॥७५॥ सरुषि नृपे स्तुतिवचनं तदभिमते प्रेम तद्विषि द्वेषः । तद्दानस्य शंसा अमन्त्रतन्त्रं वशीकरणम् ॥ ७६ ॥ " ' राजाके क्रोधकरनेमें स्तुतिके वचन, उनके इष्टमें प्रेम, उनके द्वेषवालेसे द्वेष, उनके दानकी प्रशंसा, बिना मन्त्रके वशीकरण तन्त्र है ॥ ७६ ॥ " करटक आह- करटक बोला- "यद्येवमभिमतं तर्हि शिवास्ते पन्थानः सन्तु । यथा- भिलषितम् अनुष्ठीयताम्" । सोऽपि प्रणम्य पिङ्गलका- भिमुखं प्रतस्थे । अथ आगच्छन्तं दमनकमालोक्य पिङ्गलको द्वाःस्थमब्रवीत्-" अपसार्यतां वेत्रलता । अयमस्माकं चि- रन्तनो मन्त्रिपुत्रो दमनकोऽव्याहतप्रवेशः । तत्प्रवेश्यतां द्वि- तीयमण्डलभागी" इति । स आह-"यथा अवादीत् भवान्" इति । अथोपसृत्य दमनको निर्दिष्टे आसने पिङ्गलकं प्रणम्य प्राप्तानुज्ञ उपविष्टः । स तु तस्य नखकुलिशालंकृतं दक्षिण- पाणिमुपरि दत्त्वा मानपुरःसरमुवाच-"अपि शिवं भवतः ? कस्माच्चिरात् दृष्टोऽसि ?" । दमनक आह-"न किञ्चिदेव- पादानामस्माभिः प्रयोजनम् । परं भवतां प्राप्तकालं वक्तव्यं यत उत्तममध्यमाधमैः सर्वैरपि राज्ञां प्रयोजनम् । "जो यह विचारहै तो आपके मार्ग मगलकारी हों । यथेच्छ अनुष्ठान करो"। वहभी प्रणामकर पिंगलकके सन्मुख चला । तब आते हुए दमनकको देखकर पिंगलक द्वारपालसे बोला-"वेत्रलता ( दड ) अलगकरो, यह हमारा प्राचीन मन्त्रीपुत्र बेरोकटोक प्रवेशवालाहै सो आनेदो दूसरे मण्डल ( आसन ) का अधिकारी है"। वह बोला-"जो कुछ आप आज्ञा देते हैं"। तब जाकर दमनक दिये हुए आसनमें पिंगलकको प्रणाम करके बैठा । वह तो उसके नखरूपी वज्रसे अलंकृत दक्षिण हाथको ऊपर रखकर सन्मानसे बोला- "आपको मगल है ? क्यों बहुत दिनोंमें दीखे ?"दमनक बोला-"श्रीमान्के चर-