पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) पञ्चतन्त्रम् । णोंका यद्यपि हमसे कुछ प्रयोजन नहीं है परन्तु आपसे समयपर वचन कहना उचितही है.कारण कि,उत्तम,मध्यम,अधम सभीसे राजाओंका प्रयोजन होता है । उक्तञ्च- कहाभी है- दन्तस्य निष्कोषणकेन नित्यं कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि । तृणेन कार्य्यं भवतीश्वराणां किमंग वाग्घस्तवता नरेण७७ दांतोंके कुरेदनेसे वा नित्य कर्णोंके खजानेसे तृणसे भी राजोंका कार्य होताहै हे अङ्ग ! वाणी और हाथवाले मनुष्यसे कार्य होता है सदा तो कहनाही क्या है ॥ ७७ ॥ तथा वयं देवपादानामान्वयागता भृत्या आपत्स्वपि पृष्ठ- गामिनो यद्यपि स्वमधिकारं न लभामहे तथापि देवपादा- नामेतत् युक्तं न भवति । इसी प्रकारसे हम स्वामीके चरणोंके कुलक्रमसे प्राप्त हुये भृत्य आपदोंमेंभी पीछे चलनेवाले हैं यद्यपि अपने अधिकारको प्राप्त नहीं हैं तोभी श्रीमान्के चरणोंको यह योग्य नहीं है । उक्तञ्च- कहाभी है- स्थानेष्वेव नियोक्तव्या भृत्याश्चाभरणानि च । न हि चूडामणिः पादे प्रभवामीति बध्यते ॥ ७८ ॥ भृत्य और गहने स्थानमें नियुक्त करने चाहिये । मैं प्रभुहूं ऐसा मानकर चूडामणि (शिरका भूषण) चरणपर कोई धारण नहीं करता है ॥ ७८ ॥ यतः- कारण- अनभिज्ञो गुणानां यो न भृत्यैरनुगम्यते । धनाढ्योऽपि कुलीनोऽपि क्रमायातोऽपि भूपतिः ॥ ७९ ॥ जो गुणोंसे अनभिज्ञ है; भृत्य उसको साथ नहीं देते, चाहें वह धनाढ्य कुलीन और क्रमायात राजा हो ॥ ७९ ॥