पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] भाषाटीकासमेतम् । (२७)
उक्तञ्च- कहा है कि- असमैः समीयमानः समैश्च परिहीयमाणसत्कारः । धुरि यो न युज्यमानस्त्रिभिर्थपतिं त्यजति भृत्यः ॥८०॥ जो भृत्य असमान भृत्योंसे समानताको प्राप्त किया जाय तुल्य भृत्योंसे दूर सत्कारवाला किया जाय तथा कार्यभारमें नियुक्त न किया जाय इन तीन कार- णोंसे भृत्य राजाको त्यागन करदेता है ॥ ८० ॥ यच्च अविवेकितया राजा भृत्यानुत्तमपदयोग्यान् हीना धमस्थाने नियोजयति न ते तत्रैव तिष्ठन्ति न भूपतेर्दोषो न तेषाम् । उक्तञ्च- और जो अज्ञानतासे उत्तम पदके योग्य भृत्योंको हीन अधम स्थानमें नियुक्त करता है, न वे वहा रहते हैं न राजाका दोष है न उनका । कहाभी है- कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणिखपुणि प्रतिबध्यते । न स विरोति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनी- यता ॥ ८१ ॥ सुवर्णके गहनेमे लगाने योग्य मणि यदि निकृष्ट धातुमे लगाई जाय, वह मणि न रोती है, न शोभित होती है किन्तु वैसे नियुक्त करनेवालेकी निन्दा होतीं है कि, लगानेवालेको योग्यायोग्यका ज्ञान नहीं है ॥ ८१ ॥ यच्च स्वामी एवं वदति "चिराद्दृश्यते" तदपि श्रूयताम् । सव्यदक्षिणयोर्यत्र विशेषो नास्ति हस्तयोः । कस्तत्र क्षणमप्यार्यो विद्यमानगतिर्वसेत् ॥ ८२ ॥ और जो स्वामी यह कहते हैं कि, "बहुत कालमें देखा" सोभी सुनो जिस स्थानमे दहिने वाये हाथका विशेष नहीं है, वहा सब स्थानमे जानेवाला कौन बुद्धिमान् क्षणमात्रभी स्थिति करेगा ॥ ८२ ॥ काचे मणिर्मणौ काचो येषां बुद्धिविंकल्प्यते । न तेषां सन्निधौ भृत्यो नाममात्रोऽपि तिष्ठति ॥ ८३ ॥ जिनकी बुद्धि काचमे मणि मणिमें काचका विकल्प करती है उनके निकट भृत्यजन नाममात्रकोभी स्थित नहीं होते ॥ ८३ ॥