पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) पञ्चतन्त्रम् । परीक्षका यत्र न सन्ति देशे नार्घन्ति रत्नानि समुद्रजानि । आभीरदेशे किल चन्द्रकान्तं त्रिभिर्वराटैर्विपणन्ति गोपाः ८४ जिस देशमें परीक्षा करनेवाले नहीं हैं वहां समुद्रसे उत्पन्न हुए रत्नोंका मूल्य नहीं होता ह आभीर देशमें चन्द्रकान्तमणिको गोप तीन कौडीसे खरीदते हैं ८४ लोहिताख्यस्य च मणेः पद्मरागस्य चान्तरम् । यत्र नास्ति कथं तत्र क्रियते रत्नविक्रयः ॥ ८५ ॥ लोहित मणि और पद्मरागमणिको अन्तर जहां नहीं है, वहां किस प्रकार रत्नोंका विक्रय होसक्ता है ॥ ८५ ॥ निर्विशेषं यदा स्वामी समं भृत्येषु वर्तते । तत्रोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ८६ ॥ जब स्वामी सबभृत्योंमें एकसा विशेषतः रहित वर्तता है वहां उद्यममें सम- र्थोंका उत्साह हीन हो जाताहै ॥ ८६ ॥ न विना पार्थिवो भृत्यैर्न भृत्याः पार्थिवं विना । तेषां च व्यवहारोऽयं परस्परनिबन्धनः ॥ ८७ ॥ भृत्योंके बिना राजा नहीं और न राजाके बिना भृत्य हैं, उनका यह व्यव- हार पस्पर निबन्धवाला है ॥ ८७ ॥ भृत्यैर्विना स्वयं राजा लोकानुग्रहकारिभिः । मयूखैरिव दीप्तांशुस्तेजस्व्यापि न शोभते ॥ ८८ ॥ भृत्योंके बिना राजा ऐसे शोभित नहीं होता जिस प्रकार लोककी अनुग्रह- करनेवाली किरणोंके बिना तेजस्वी सूर्य नहीं शोभित होता है ॥ ८८ ॥ अरैः सन्धाय्र्यते नाभिर्नाभौ चाराः प्रतिष्ठिताः । स्वामिसेवकयोरेवं वृत्तिचक्रं प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥ अरोंमें नाभि और नाभ (पुट्ठी) में अरे स्थित रहते हैं, इस प्रकारसे यह स्वामी सेवकका आजीविका चक्र चलता है ॥ ८९ ॥ शिरसा विधृता नित्यं स्नेहेन परिपालिताः । केशा अपि विरज्यन्ते निःस्नेहाः किं न सेवकाः ॥ ९० ॥ नित्य शिरसे धारण किये स्नेहसे परिपालित तेलके बिना केशभी रूखे हो जाते हैं, क्या सेवक न होंगे ॥ ९० ॥