भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३९२ ) पञ्चतन्त्रम् । “तीक्ष्णोपायप्राप्तिगम्योऽपि योऽर्थ- स्तस्याप्यादौ संश्रयः साधुयुक्तः । उत्तुङ्गाग्रः सारभूतो वनानां मान्याभ्यर्च्यश्छिद्यते पादपेन्द्रः ॥ २५९ ॥ “जो वस्तु तीक्ष्ण उपायसे प्राप्ति होनेके योग्य है उसके पहलेभी श्रेष्ठता युक्त संश्रय करना चाहिये, अति उन्नत अग्रभागवाला वनोंमें श्रेष्ठ वृक्ष सत्कारसे पूजित हुआ छेदित होताहै (वनस्पति छेदनमें पहले उसका सम्मान होताहै इसी प्रकार पहले शत्रुसे सान्त्वना पीछे उसमें प्रवेश करे यह भावहै) ॥ २५९ ॥ अथवा स्वामिन् ! किं तेन अभिहितेन यत् अनन्तरकाले क्रियारहितमसुखसाध्यं वा भवति । साधु चेदमुच्यते । अथवा स्वामिन् उस कथनसे क्या है जो समयके अनन्तर क्रियारहित वा असुख साध्य होजावे । यह अच्छा कहाहै- अनिश्चितैर्व्यवसायभीरुभिः पदे पदे दोषशतानुदर्शिभिः । फलैर्बिसंवादमुपागता गिरः प्रयान्ति लोके परिहासवस्तुताम् ॥ २६० ॥ अनिश्चित उद्योगसे डरे हुए तथा पदपदमें सैकडो दोषके दिखानेवाले फलोंसे विपरीतताको प्राप्त हुई वाणी लोकमें परिहासके स्थानको प्राप्त होतीहै (विफल वागाडम्बरसे केवल अपनी लघुता प्रकाश होती है वंशस्थ वृत्त) ॥ २६० ॥ न च लघुषु अपि कर्त्तव्येषु धीमद्भिः अनादरः कार्य्यः। यतः- लघुकर्त्तव्यमें भी बुद्धिमान्‌को अनादर करना न चाहिये । जिससे- शक्ष्यामि कर्तुमिदमल्पमयत्नसाध्य- मत्रादरः क इति कृत्यमुपेक्षमाणाः । केचित्प्रमत्तमनसः परितापदुःख- मापत्प्रसंगसुलभं पुरुषाः प्रयान्ति ॥ २६१ ॥ मैं इसके करनेको समर्थ हूं, यह अल्प और बिना यत्नके ही साध्य है, इस कार्यमें यत्न करना क्या इस प्रकार कार्यकी उपेक्षा करनेवाले प्रमत्तचित्त पुरुष आपत्तिके आगममें सुलभ परितापरूपी दुःखको प्राप्त होते हैं ॥ २६१ ॥