पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (३९३) तदद्य जितारेः मद्विभोः यथापूर्व्वं निद्रालाभो भविष्यति। उच्यते चैतत्- सो आज शत्रुको जीतनेवाले मेरे प्रभुको पूर्वकी समान निद्राकी प्राप्ति होगी । कहा है कि- निःसर्पे बद्धसर्पे वा भवने सुप्यते सुखम् । सदा दृष्टभुजंगे तु निद्रा दुःखेन लभ्यते ॥ २६२ ॥ सर्पहीन वा सर्पके पकडे जानेपर घरमें निश्शंक सोया जाता है जहा सदा सर्प दीखे वहा दुःखसे निद्रा प्राप्त होती है ॥ २६२ ॥ तथाच- और देखो- विस्तीर्णव्यवसायसाध्यमहतां स्निग्धोपभुक्ताशिषां कार्याणां नयसाहसोन्नतिमर्तामिच्छापदारोहिणाम् । मानोत्सेकपराक्रमव्यसनिनां पारं न यावद्गताः सामर्षे हृदयेऽवकाशविषया तावत्कथं निर्वृतिः ॥ २६३ ॥ बडे मानसे उन्नत पराक्रममें आसक्त मनुष्य जबतक बडे उद्योगसे साध्य महान् स्निग्धोंके आशीर्वाद युक्त वधुओंसे चिन्तित नीति साहस उन्नतिवाले अभीष्ट पदपर आरोहण करनेवाले कार्योंको करनेवाले जबतक अभिलषित कार्यके पार नहीं गये हैं तबतक क्रोधवाले हृदयमें सुख किस प्रकार ठहर सक्ताहै २६३ तदवसितकार्य्यारम्भस्य विश्राम्यतीव मे हृदयम् । तदि- दमधुना निहतकण्टकं राज्यं प्रजापालनतत्परो भूत्वा पुत्रपौ- त्रादिक्रमेण अचलच्छत्रासनश्रीः चिरं भुङ्क्ष्व, अपि च,- सो आरभ किये कार्यको पूराकिया जिसने ऐसे मेरा हृदय विश्रामको प्राप्त होताहै सो यह अब निष्कंटक प्रजापालनमें तत्पर होकर पुत्र पौत्रादिके क्रमसे अचल छत्र आसन लक्ष्मी चिरकाल तक भोगो । ओरभी- प्रजा न रञ्जयेद्यस्तु राजा रक्षादिभिर्गुणैः । अजागलस्तनस्येव तस्य राज्यं निरर्थकम् ॥ २६४ ॥ जो राजा रक्षा आदि गुणोंसे प्रजाको प्रसन्न नहीं करता हे बकरीके गलेके स्तनकी समान उसका राज्य निरर्थक है ॥ २६४॥