पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (४११) गंगदत्तने काले सर्पको खखोडलमे धरकर उन दायादोको दिखाया वे उसने शनैः २ खालिये । तब मण्डूकोंका अभाव देखकर सर्पने कहा-“भद्र ! तुम्हारे *शत्रु तो निःशेष होगये सो मुझे कुछ और भोजन दो, जो कि तुम मुझे यहा लाये हो” । गंगदत्त बोला-“मित्र ! तुमने मित्रका कार्य किया है । सो अब इसी ढेकलीके मार्गसे जाओ” । सर्प बोला-“भो गंगदत्त ! तुमने अच्छा नहीं कहा कैसे मैं वहां जाऊ । मेरा बिलदुर्ग औरोंने घेर लिया होगा इस कारण यहीं स्थित हुए मुझे एक एक मेढक अपने कुटुम्बका दो । नहीं तो सबको खाजा- ऊंगा” यह सुन गंगदत्त व्याकुल मनसे विचारने लगा । “अहो ! सर्पको लाकर यह मैंने क्या किया । सो यदि निषेध करू तो यह सबहीको खाजायगा । अथवा युक्त कहा है- योऽमित्रं कुरुते मित्रं वीर्याभ्यधिकमात्मनः । स करोति न सन्देहः स्वयं हि विषभक्षणम् ॥ २५ ॥ जो अपने पराक्रमसे अधिक अमित्रको मित्र करता है इसमें सन्देह नहीं वह स्वयंही विष भक्षण करता है ॥ २५ ॥ तत् प्रयच्छामि अस्य एकं दिनं प्रतिसुहृदम् । उक्तञ्च- सो प्रतिदिन इसको मै एक एक सुहृद दू । कहा है- सर्वस्वहरणे युक्तं शत्रुं बुद्धियुता नराः । तोषयन्त्यल्पदानेन वाडवं सागरो यथा ॥ २६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य सर्वस्व हरण करनेमें युक्त हुए शत्रुको अल्प दानसे सन्तुष्ट करे जैसे सागर वडवा अग्निको प्रतिदिन अल्प जल देताहै ॥ २६ ॥ तथाच- और देखो- यो दुर्बलोऽप्यूनमपि याच्यमानो बलीयसा यच्छति नैव साम्ना । प्रयच्छते नैव च दर्शमानं खारीं स चूर्णस्य पुनर्ददाति ॥ २७ ॥ जो दुर्बल प्रबलकी सात्वनापूर्वक याचना करनेपर अल्पभी प्रदान नहीं करता है तथा दर्शमानभी नहीं देता है वह डाटनेसे चूर्णके स्थानमें खारी