भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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परिमाण द्रव्यको फिर देता है (अर्थात् बलवानके थोडा मांगने पर न देनेसे फिर अधिक देना पडता है) उपजाति वृत्त ॥ २७ ॥ तथाच- और देखो- सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्द्धं त्यजति पण्डितः । अर्द्धेन कुरुते कार्य्यं सर्वनाशो हि दुस्तरः ॥ २८ ॥ सर्व नाश उत्पन्न होनेमें पंडित जन आधा त्याग देते हैं और आधेसे कार्य करते हैं, सर्व नाश बडा दुस्तर है ॥ २८ ॥ न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः । एतदेव हि पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्भूरिरक्षणम् ॥ २९ ॥" बुद्धिमान् मनुष्य थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करे यही चतुराई है कि थोडे देकर बहुतकी रक्षा करनी ॥ २९ ॥" एवं निश्चित्य नित्यमेकैकं आदिशति । सोऽपि तं भक्ष- यित्वा तस्य परोक्षेऽन्यानपि भक्षयति । अथवा साधु इदमुच्यते- ऐसा विचार कर नित्यही एक एक देने लगा। वहभी उसे भक्षण कर उसके पीछेमें औरोंकोभी भक्षण कर जाता । अथवा यह अच्छा कहा है- यथा हि मलिनैर्वस्त्रैर्यत्र तत्रोपविश्यते । एवं चलितवित्तस्तु वित्तशेषं न रक्षति ॥ ३० ॥ जैसे मलीन वस्त्र पहरे हुए मनुष्य जहां तहां बैठ जाता है इस प्रकार निर्धन होनेपर यह प्राणी शेष धनकी भी रक्षा नहीं करता है ॥ ३० ॥ अथ अन्यदिने तेन अपरान् मण्डूकान् भक्षयित्वा गङ्गदत्त- सुतो यमुनादत्तो भक्षितः । तं भक्षितं ज्ञात्वा गङ्गदत्तः तार- स्वरेण धिक् धिक् प्रलापपरः कथञ्चिदपि न विरराम । ततः स्वपत्न्या अभिहितः- तब दूसरे दिन वह और मेडकोंको भक्षण करके गंगदत्तके पुत्र यमुनादत्तको भी भक्षण कर गया उसको खाया हुआ जानकर गंगदत्त तारस्वरसे अपनेको धिक् धिक् करता हुआ किंचित् काल भी विरामको प्राप्त न हुआ। तब उसकी स्त्रीने कहा-