भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (४२३) किसी एक स्थानमें कुभार रहता था वह कभी प्रमादसे आधे टूटे घडेके तीक्ष्ण कोरके ऊपर वेगसे धावमान होकर पतित हुआ । तब उस ठीकडेकी कोरसे माथा फट जानेके कारण रुधिरसे लिप्त शरीर होकर कठिनतासे उठ अपने घरको गया । तब अपथ्यसेवनसे वह प्रहार उसका अधिक होगया और कठिन- तासे निरोगताको प्राप्त हुआ । तब एक समय दुर्भिक्षसे पीडित देशके होनेमें वह कुंभार भूखसे व्याकुल कठ किन्ही राजसेवकोंके साथ देशान्तरमें जाकर किसी राजाका सेवक हुआ । वह राजाभी उसके माथेमें तीक्ष्ण प्रहारका घाव देखकर विचारने लगा 'यह कोई वीरपुरुष है । इससे माथेके सामने सम्मुख प्रहार सहन किया है'। इस कारण उसको सम्मानादिसे सम्पूर्ण राजपुत्रोंके मध्य विशेषप्रसन्न- तासे देखता । वेभी राजपुत्र उसकी अधिक प्रसन्नताको देखते हुए परम ईर्षा- धर्मको वहन करते राजभयसे कुछभी न बोले । तब और दिन उस वीरसंभावना (परीक्षा) करनेमें विग्रह होनेपर हाथियोंके कल्पित होनेमें और घोडोंके सज्जित होनेपर तथा योद्धाओंके प्रकृष्ट सज्जित होनेपर उस राजाने प्रसङ्गसे प्राप्त हुए एका- न्तमें उससे पूछा ।--"भो गजपुत्र ! तुम्हारा क्या नाम ? क्या जाती है ? किस सङ्ग्राममें यह प्रहार तुम्हारे मस्तकमें लगा है ?" वह बोला--"देव ! यह शस्त्रप्रहार नहीं है मैं युधिष्ठिर नामवाला कुभार हू । मेरे घरमे अनेक फूटे बर्तन थे, सो एक समयमें मद्यपान करके निकला दौडता हुआ बर्तनोंपर गिरा उसके प्रहा- रका विकार यह मेरे माथेमें विकरालताको प्राप्त हो गया है" । यह सुन राजा लज्जित हो बोला--"अहो राजपुत्रका अनुकरण करनेवाले इस कुभारने मुझे ठगलिया, सो अभी गलहस्त देकर इसे निकालदो" । ऐसा कहनेपर कुम्भकार बोला--"ऐसा मत करो, रणमें मेरा हस्तलाघव देखो" । राजा बोला--"भो ! आप सर्वगुणसपन्न हो तो भी जाओ । कहा है- शूरश्च कृतविद्यश्च दर्शनीयोऽसि पुत्रक । यस्मिन्कुले त्वमुत्पन्नो गजस्तत्र न हन्यते ॥ ४० ॥" हे पुत्र ! तू शूर विद्यावान् और दर्शनीय है परन्तु जिस कुलमे उत्पन्न हुए हो उसमें हस्ती नहीं मारे जाते ॥ ४० ॥ कुलाल आह--"कथमेतत् ?" राजा कथयति - कुलाल बोला-"यह कैसी कथा है ?" राजा कहने लगा-