भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४४१ ) जितना मेरा पांडित्य हे तेरा उससे दूना हे, हा जारभी गया और भर्ताभी नहीं हे नाग्निके ! क्या देखती है ? ॥ ६४ ॥” एवं तस्य कथयतः पुनरन्येन जलचरेण आगत्य निवे- दितम्-“यदहो ! त्वदीयं गृहमपि अपरेण महामकरेण गृही- तम्” । तत् श्रुत्वा असौ अतिदुःखितमनाः तं गृहात् निःसा- रयितुं उपायं चिन्तयन् उवाच,-“अहो ! पश्यतां मे दैवोप- हतत्वम् । इस प्रकार उसके कहनेपर फिर दूसरे जलचरने आकर कहा-“अहो ! तुम्हारा घरभी दूसरे महामकरने ग्रहण कर लिया”। उसे सुन यह दुःखीमनसे उसे घरसे निकालनेको उपाय विचारता हुआ बोला । मेरे प्रारब्धका घात तो देखो- मित्रं ह्यमित्रतां यातमपरं मे प्रिया मृता । गृहमन्येन च व्याप्तं किमद्यापि भविष्यति ॥ ६५ ॥ मित्र अमित्र हुआ और प्रिया मेरी मरगई घर दूसरेको प्राप्त हुआ अब क्या होगा ! ॥ ६५ ॥ अथवा युक्तमिदमुच्यते- अथवा यह युक्तही कहा है- क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्ण- मन्नक्षये वर्द्धति जाठराग्निः । आपत्सु वैराणि समुद्भवन्ति वामे विधौ सर्वमिदं नराणाम् ॥ ६६ ॥ घावके ऊपर वारवार प्रहार पडते हैं, अन्नके क्षयमें भूख बढती है आपदामें वैरी वढते हैं, विधाताके वाम होनेमें मनुष्योंको यह सब कुछ होता है ॥ ६६ ॥ तत् किं करोमि ! किमनेन सह युद्धं करोमि ? किंवा साम्ना एव सम्बोध्य गृहात् निःसारयामि । किंवा भेदं दानं वा करोमि ? अथवा अमुमेव वानरमित्रं पृच्छामि ? उक्तञ्च- सो क्या करूं ! क्या उसके साथ युद्ध करूं ? या साम उपायसे समझाकर घरसे निकालू ?। अथवा भेद वा धनसे सन्तुष्ट करूं ?। अथवा इस वानर मित्रसे ही पूछूं ? कहा है-