भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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यः पृष्ट्वा कुरुते कार्य्यं प्रष्टव्यानस्वहितान्गुरून् । न तस्य जायते विघ्नः कस्मिंश्चिदपि कर्मणि ॥ ६७ ॥ जो अपने पूछनेमें योग्य हितकारी गुरुओंसे पूछकर कार्य करता है उसको किसी काममें विघ्न नहीं होता है ॥ ६७ ॥” एवं सम्प्रधार्य्य भूयोऽपि तमेव जम्बुवृक्षमारूढं कपिम- पृच्छत्,–“भो मित्र ! पश्य मे मन्दभाग्यताम् । यत् सम्प्रति गृहमपि मे बलवत्तरेण मकरेण रुद्धम् । तदहं त्वां प्रष्टुमभ्या- गतः । कथय किं करोमि ? । सामादीनाम् उपायानां मध्ये कस्य अत्र विषयः”। स आह–“भोः कृतघ्न ! पापचारिन् ! मया निषिद्धोऽपि किं भूयो मामनुसरसि, नाहं तव मूर्खस्य उपदेशमपि दास्यामि”। तच्छ्रुत्वा मकरः प्राह–“भो मित्र ! सापराधस्य मे पूर्वस्नेहमनुस्मृत्य हितोपदेशं देहि,” वानर आह–“न अहं ते कथयिष्यामि । यत् भार्य्यावाक्येन भवता अहं समुद्रे प्रक्षेप्तुं नीतः, तदेवं न युक्तं यद्यपि भार्य्या सर्व- लोकादपि वल्लभा भवति तथापि न मित्राणि बान्धवाश्च भार्य्यावाक्येन समुद्रे प्रक्षिप्यन्ते । तन्मूर्ख ! मूढत्वेन नाशः तव मया प्रागेव निवेदित आसीत् । यतः– ऐसा विचार फिर भी उस जामुनके वृक्षपर चढ़े वानरसे पूछने लगा--“भो मित्र ! मेरी मन्दभाग्यता तो देखो कि, इस समय घर भी मेरा बलवान् मकरने ग्रहण करलिया । सो मैं तुझसे पूछनेको आया हूं कह क्या करूं ? सामादि उपायोंमें इस समय कौन उचित है”। वह बोला,--“भो कृतघ्न पापिष्ठ ! मुझसे निषेधको प्राप्त हुआ भी फिर मुझसे क्यों पूछता है । मैं तुझ मूर्खको उपदेशभी नहीं दूंगा”। यह सुनकर मकर बोला,–“भो मित्र ! मैं अपराधीहूं पर मेरा पूर्वस्नेह स्मरण कर हितोपदेश दे”। वानरने कहा,–“मैं तुझसे नहीं कहूंगा । जो भार्यावाक्यसे तुम मुझे समुद्रमें डालनेको लेगये थे सो युक्त नहीं किया । यद्यपि भार्या सर्व लोकसे भी प्यारी होती है तथापि मित्र और बन्धु भार्याके वाक्यसे सागरमें नहीं डाले जाते हैं सो मूर्ख ! मूढ होनेसे तेरा नाश मैंने प्रथमही कह दियाथा। क्यों कि-