भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (४५३) प्रविश्य विविधान्नानि भक्षयन् परां तृप्तिं गच्छति । परं तद्गृहात् बहिर्निष्क्रान्तोऽन्यैः मदोद्धत्सारमेयैः सर्वदिक्षु परिवृत्य सर्वाङ्गेषु दंष्ट्राभिः विदार्य्यते । ततः तेन विचिन्ति- तम्,-"अहो ! वरं स्वदेशो यत्र दुर्भिक्षेऽपि सुखेन स्थीयते, न च कोऽपि युद्धं करोति, तदेव स्वनगरं व्रजामि” इति अवधार्य्य स्वस्थानं प्रति जगाम । अथ असौ देशान्तरात् समायातः सर्वैरपि स्वजनैः पृष्टः,-“भोः चित्राङ्ग ! कथय अस्माकं देशान्तरवार्त्ताम्, कीदृग्देशः? किंचेष्टितं लोकस्य ! क आहारः, कश्च व्यवहारः तत्र ?” इति । स आह,-“किं कथ्यते विदेशस्य स्वरूपविषयः । किसी स्थानमें चित्रांगनामक कुत्ता रहता था । वहा बहुत कालतक दुर्भिक्ष पड गया। अन्नके अभावसे कुत्तों आदिके यूथ भ्रष्ट होगये । तब चित्राग भयसे देशान्तरको गया । वहा किसी एक नगरमें किसी गृहस्थकी स्त्रीके प्रमादसे प्रति- दिन घरमे प्रवेशकर अनेक अन्नको खाकर परम तृप्तिको प्राप्त होता । परन्तु उसके घरसे निकलते और मदसे उद्धत कुत्तोंसे सब ओरसे घिरकर सर्वाङ्गमें दाढोंसे विदीर्ण होता । तब उसने विचार किया, – “अहो अपना देश अच्छा है जहा दुर्भिक्षमेंभी सुखसे रहा जाता है। न कोई युद्ध करता है, इससे अपने नगरको जाता हूं”। ऐसा विचारकर अपने स्थानको गया । तब इस देशान्तरसे आये हुएसे सब कुत्तेाने पूछा, - "भो चित्राग ! हमसे देशान्तरकी वार्त्ता कहो । वह कैसा देश है ? लोगोंकी कैसी चेष्टा है ? । कैसा आहार और कैसा वहाका व्यवहार है ?” । वह बोला, - "विदेशका स्वरूप और वार्ता क्या कहें- सुभिक्षाणि विचित्राणि शिथिलाः पौरयोषितः । एको दोषो विदेशस्य स्वजातिर्यद्विरुध्यते ॥ ८२ ॥” खाने योग्य विचित्र अन्नोंमें पुरस्त्रियें सदा हाथ ढीला किये रहती हैं। विदे- शमें एकही दोष है कि जो अपनी जाति विरुद्ध रहती है ॥ ८२ ॥” सोऽपि मकरः तदुपदेशं श्रुत्वा कृतमरणनिश्चयो वानरम् अनुज्ञाप्य स्वाश्रयं गतः । तत्र च तेन स्वगृहप्रविष्टेन आतता-