भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ४५४ ) पञ्चतन्त्रम् । र्थिना सह विग्रहं कृत्वा दृढसत्त्वावष्टम्भनाच्च तं व्यापाद्य स्वाश्रयञ्च लब्ध्वा सुखेन चिरकालम् अतिष्ठत् । साधु इद- मुच्यते,- वहभी मकर उसके उपदेशको ग्रहणकर मरणमें निश्चयकर वानरकी आज्ञा ले अपने स्थानको गया । तब उसने अपने घरमें प्रवेशकर उस शत्रुके साथ युद्धकर दृढ बलकी प्राप्ति होनेसे उसे मारकर अपने स्थानको ले सुखसे चिर- कालतक स्थिति की । यह अच्छा कहा है- अकृत्य पौरुषं या श्रीः किं तयापि सुभोग्यया । रद्गवः समश्नांति दैवादुपगतं तृणम् ॥ ८३ ॥ इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रके लब्धप्रणाशं नाम चतुर्थ तन्त्रं समाप्तम् । जो लक्ष्मी बिना पराक्रमके प्राप्त होती है भोगने योग्य अनायास प्राप्त हुई उस लक्ष्मीसे क्या है जैसे बूढा गो ( वृषभ ) दैवसे प्राप्त हुए तृणोंको खाता है ॥ ८३ ॥ इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पंचतंत्रके पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषा- टीकायां लब्धप्रणाशं नाम चतुर्थं तंत्रं समाप्तम् ॥