भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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अथ अपरीक्षितकारकं पंचमं तन्त्रम्। अथ इदमारभ्यतेऽपरीक्षितकारकं नाम पञ्चमं तन्त्रं यस्य अयम् आदिमः श्लोकः- अब यह (१) अपरीक्षितकारकनाम पांचवा तंत्र आरंभ किया जाता है जिसके आदिमें यह श्लोक है- कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् । तन्नरेण न कर्त्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥ १ ॥ जो कुदृष्ट हो, कुत्सित जाना गयाहो, बुरी प्रकार सुनाहो, जो बुरी प्रकार परीक्षा किया हो वह मनुष्यको नहीं करना चाहिये जैसा कि इस संसारमें नाईने किया ॥ १ ॥ तद्यथा अनुश्रूयते- सो ऐसा सुना है- कथा १. अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे पाटलिपुत्रं नाम नगरम् । तत्र मणिभद्रो नाम श्रेष्ठी प्रतिवसति स्म । तस्य च धर्मार्थकाम- मोक्षकर्माणि कुर्वतो विधिवशात् धनक्षयः सञ्जातः । ततो विभवक्षयात् अपमानपरम्परया परं विषादं गतः । रात्रौ सुप्तः चिन्तितवान्,-"अहो ! धिक् इमां दरिद्रताम् । उक्तञ्च- दक्षिणके देशमें पाटलिपुत्रनाम एक नगर है। वहा मणिभद्रनाम एक सेठ रहताथा, उसके धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको सेवन करते प्रारब्ध वशसे धन क्षय होगया। तब धनके क्षय होनेके कारण अपमानकी परम्परासे परम विषादको प्राप्त हुआ, रातमें सोता हुआ विचारने लगा,-"अहो ! इस दरिद्रताको धिकार है। कहा है कि- शीलं शौचं क्षान्तिर्दाक्षिण्यं मधुरता कुले जन्म । न विराजन्ति हि सर्वे वित्तविहीनस्य पुरुषस्य ॥ २ ॥ १ बे समझे करना ।