भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३२ ) पञ्चतन्त्रम् । तत् ऐकान्तिके मद्विज्ञाप्यमाकर्णयन्तु देवपादाः । यतः- सो एकान्तमें स्वामीके चरण मेरी विज्ञप्तिको श्रवण करें कारण कि- षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रश्चतुष्कर्णः स्थिरो भवेत् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन षट्कर्णं वर्जयेत्सुधीः ॥ १०८ ॥ " छः कानमें मंत्र भेदको प्राप्त होता है, चारकर्णमें स्थिर होता है इस कारण बुद्धिमान् सब प्रकार षट्कर्णको वर्जित करें ॥ १०८ ॥ " अथ पिंगलकाभिप्रायज्ञा व्याघ्रद्वीपिबृकपुरःसराः सर्वेऽपि तद्वचः समाकर्ण्य संसदि तत्क्षणादेव दूरीभूताः । ततश्च दमनक आह- "उदकग्रहणार्थं प्रवृत्तस्य स्वामिनः किमिह निवृत्त्यावस्थानम्" । पिंगलक आह-(सविलक्षस्मितम् ) “न किञ्चिदपि” । सोऽब्रवीत्- " देव ! यदि अनाख्येयं तत्तिष्ठतु । उक्तञ्च- तब पिंगलकके अभिप्राय जाननेवाले व्याघ्र गैंडे वृक आदि सब कोई उसके वचनको श्रवण कर सभामेसे उसी समय दूर होगये । दमनक बोला- "जल ग्रहणके लिये गये हुए स्वामी क्यों लौटकर यहां स्थित हुए”। पिङ्गलकने लज्जासे कुछ हास्यके सहित कहा- "कुछ नहीं" उसने कहा- "देव ! यदि कहनेके योग्य नहीं है तो जाने दीजिये । कारण कहा है- दारेषु किञ्चित्स्वजनेषु किञ्चिद्गोप्यं वयस्येषु सुतेषु किञ्चित् । युक्तं न वा युक्तमिदं विचिन्त्य वदेद्विपश्चिन्महतोऽनुरोधात्॥” कुछ स्त्रियोंमें, कुछ स्वजनोंमें, कुछ बन्धुओंमें, कुछ पुत्रोंमें गुप्त रक्खे; परन्तु विद्वान् यह युक्त है वा नहीं ऐसा विचार कर महाकार्यके वशसे गुप्तभी कहे ॥ १०९ ॥ " तच्छ्रुत्वा पिंगलर्कश्चिन्तयामास । “ योग्योऽयं दृश्यते । तत् कथयामि एतस्य अग्रे आत्मनोऽभिप्रायम् । उक्तञ्च- यह सुनकर पिंगलर्क विचार करने लगे "यह तो योग्य ही है सो इसके आगे अपना अभिप्राय कथन करूं, क्योंकि- सुहृदि निरन्तरचित्ते गुणवति भृत्येऽनुवर्त्तिनि कलत्रे । स्वामिनि सौहृद्युक्ते निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥ ११० ॥