भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३३ निरन्तर चित्तवाले सुहृद्मे, गुणवान् भृत्यमे, अनुगामिनी स्त्रीमे, सौहार्दयुक्त स्वामीमें दुःख निवेदन कर सुखी होता है ॥ ११० ॥ भो दमनक ! शृणोषि शब्दं दूरात् महान्तम् ?” । सोऽब्र- वीत-“स्वामिन् ! शृणोमि ततः किम्” ? पिंगलक आह- “भद्र ! अहमस्मात् वनात् गन्तुमिच्छामि”। दमनक आह- “कस्मात्” ? । पिंगलक आह-“यतोऽद्य अस्मद्वने किमपि अपूर्व सत्त्वं प्रविष्टं यस्य अयं महाशब्दः श्रूयते । तस्य च शब्दानुरूपेण पराक्रमेण भाव्यमिति”। दमनक आह-“यत् शब्दमात्रादपि भयमुपगतः स्वामी तदपि अयुक्तम् । उक्तञ्च- भो दमनक ! क्या तू दूरसे महान् शब्द श्रवण करता है”? । वह बोला- “स्वामिन् ! सुनता हू सो क्या”? । पिंगलक बोला-“भद्र ! मैं इस वनसे जानेकी इच्छा करता हूं”। दमनक बोला-“क्यों ?” । पिंगलक बोला-“जो कि, इस वनमे कोई अपूर्व जीव आया; जिसका यह महाशब्द सुनाई देता है । शब्दके अनुरूप इसका पराक्रम भी होगा”। दमनक बोला-“यदि स्वामीको शब्दमात्रसेभी भय प्राप्त हुआ है, सोभी युक्त नहीं है । कहा है- अम्भसा भिद्यते सेतुस्तथा मन्त्रोऽप्यरक्षितः । पैशुन्याद्भिद्यते स्नेहो भिद्यते वाग्भिरातुरः ॥ १११ ॥ जैसे जलसे सेतु भेदको प्राप्त होता है इसी प्रकार अरक्षित मन्त्र भेदको प्राप्त होता है (दुर्जनतासे) चुगलीसे स्नेह और पीडित जन शुष्क कथासे भेदको प्राप्त होता है ॥ १११ ॥ तन्न युक्तं स्वामिनः पूर्वोपार्जितं वनं त्यक्तुम् । यतो भेरीवेणुवीणामृदंगतालपटहशंखकाहलादिभेदेन शब्दा अनेक विधा भवन्ति । तत् न केवलात् शब्दमात्रादपि भेतव्यम् । उक्तञ्च- सो स्वामीको कुलक्रमागत वन त्यागना उचित नहीं है, जो कि भेरी, वेणु वीणा, मृदंग, ताल, पटह, काहलादिके भेदसे शब्द अनेक प्रकारके होते हैं, सो केवल शब्दमात्रसेही न डरना चाहिये । कहा है- ३