भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३४ ) पञ्चतन्त्रम् । अत्युत्कटे च रौद्रे च शत्रौ प्राप्ते न हीयते । धैर्यं यस्य महीनाथो न स याति पराभवम् ॥ ११२ ॥ जिस राजाका धैर्य अति उत्कट (दारुण) भयानक शत्रुके प्राप्त होनेसेभी नष्ट नहीं होताहै, उसका कभी पराभव नहीं होता ॥ ११२ ॥ दर्शितभयेऽपि धातरि धैर्यध्वंसो भवेन्न धीराणाम् । शोषितसरसि निदाघे नितरामेवोद्धतः सिन्धुः ॥ ११३ ॥ विधाताकेभी भय दिखानेसे धीरोका धैर्यध्वंस नहीं होताहै, गरमीमें सरोवर सूखते हैं, परन्तु सिन्धु अत्यन्त बढताही है ॥ ११३ ॥ तथाच- और देखो- यस्य न विपदि विषादः सम्पदि हर्षो रणे न भीरुत्वम् । तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥११४॥ जिसको विपत्तिमें विषाद, सम्पत्तिमें हर्ष और रणमें भय नहीं होताहै, उस त्रिभुवनके तिलक किसी विरलेही पुत्रको माता उत्पन्न करती है ॥ ११४ ॥ तथाच- औरभी- शक्तिवैकल्यनम्रस्य निःसारत्वाल्लघीयसः । जन्मिनो मानहीनस्य तृणस्य च समा गतिः ॥ ११५ ॥ शक्तिकी विकलतासे नम्र हुए, निस्सार होनेसे अत्यन्त लघु, मानहीन जन्म धारीकी और तृणकी समान गति है ॥ ११५ ॥ अपिच- और भी अन्यप्रतापमासाद्य यो दृढत्वं न गच्छति । जतुजाभरणस्येव रूपेणापि हि तस्य किम् ॥ ११६ ॥ दूसरेके प्रतापको प्राप्त होकर जो दृढताको नहीं प्राप्त होताहै लाखके आभर- रणकी समान उसके रूपसे भी क्या है ॥ ११६ ॥ तदेवं ज्ञात्वा स्वामिना धैर्यावष्टम्भः कार्यः । न शब्दमा- त्रात् भेतव्यम् । उक्तञ्च-