भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 476

भाषाटीकासमेतम्। ( ४६१ )

हुए किसी भक्त श्रावकको देखकर उसके घर चले जाते है, और उसकी अत्यन्त प्रार्थनासे उसके घरमें प्राणधारण मात्र भोजन क्रियाको करते हैं, सो जाओ फिर ऐसा न कहना" । यह सुन नापित बोला- "भगवन् ! मैं आपका धर्म जानता हूं, परन्तु आपको बहुत श्रावक ( सरावगी ) बुलाते हैं, मैंने तो इस समय बहुतसे पुस्तकके बांधने योग्य वस्त्र बहु मूल्यके संग्रह किये हैं । तथा पुस्तकोके निमित्त लेखकोंको धन एकत्र किया स्थित है । सो सर्वथा समयके उचित कार्य करो" । तब नाईभी अपने घर गया । और वहाजाकर खैरकी लकडीको तयार कर दोनों किवाड़ घरकी बन्दकर डेढ पहरतक फिरभी विहारद्वार परस्थित होकर सबके क्रमसे आश्रमसे निकलनेपर वडी प्रार्थनासे उन्हें अपने घरमें लाया । वेभी सब कपट और धनके लोभसे, भक्तियुक्त जाने पूछे हुए सरावागियोंको छोडकर प्रसन्न- मनसे उसके पीछे २ गये । यह अच्छा ही कहा है कि- एकाकी गृहसंत्यक्तः पाणिपात्री दिगम्बरः । सोऽपि संवाह्यते लोके तृष्णया पश्य कौतुकम् ॥ १५ ॥ जो इकळा गृहशून्य हाथरूपी पात्रवाला दिगम्बर ( नग्न है ) वहभी संसारमें तृष्णासे हरण होता है इस कौतुकको देखो ॥ १५ ॥ जीर्य्यन्ते जीर्य्यतः केशा दन्ता जीर्य्यन्ति जीर्य्यतः । चक्षुः श्रोत्रे च जीर्य्येते तृष्णैका तरुणायते ॥ १६ ॥ बूढ़े होनेसे बाल जीर्ण होजाते हैं, जीर्ण होनेसे दातभी जीर्ण होजाते हैं नेत्र और कानभी जीर्ण होजाते हैं एक तृष्णाही तरुण होती जाती है ॥ १६ ॥ अपरं गृहमध्ये तान् प्रवेश्य द्वारं निभृतं विधाय लगुड- प्रहारैः शिरसि अताडयत्, तेऽपि ताड्यमाना एके मृताः अन्ये भिन्नमस्तकाः फूत्कर्त्तुम् उपचक्रमिरे । अत्रान्तरे तमा- क्रन्दम् आकर्ण्य कोटरक्षपालैः अभिहितं,-"भो भोः ! किम् अयं महान् कोलाहलो नगरमध्ये ? तद्गम्यतां गम्यताम्" । ते च सर्वे तदादेशकारिणः तत्सहिता वेगात् तद्गृहं गताः तावत् रुधिरप्लावितदेहाः पलायमाना नग्नका दृष्टाः । तैः स नापितो बद्धः । हतशेषैः सह धर्माधिष्ठानं नीतः । तैः नापितः