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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

भाषाटीकासमेतम्। ( ४६१ )

हुए किसी भक्त श्रावकको देखकर उसके घर चले जाते है, और उसकी अत्यन्त प्रार्थनासे उसके घरमें प्राणधारण मात्र भोजन क्रियाको करते हैं, सो जाओ फिर ऐसा न कहना" । यह सुन नापित बोला- "भगवन् ! मैं आपका धर्म जानता हूं, परन्तु आपको बहुत श्रावक ( सरावगी ) बुलाते हैं, मैंने तो इस समय बहुतसे पुस्तकके बांधने योग्य वस्त्र बहु मूल्यके संग्रह किये हैं । तथा पुस्तकोके निमित्त लेखकोंको धन एकत्र किया स्थित है । सो सर्वथा समयके उचित कार्य करो" । तब नाईभी अपने घर गया । और वहाजाकर खैरकी लकडीको तयार कर दोनों किवाड़ घरकी बन्दकर डेढ पहरतक फिरभी विहारद्वार परस्थित होकर सबके क्रमसे आश्रमसे निकलनेपर वडी प्रार्थनासे उन्हें अपने घरमें लाया । वेभी सब कपट और धनके लोभसे, भक्तियुक्त जाने पूछे हुए सरावागियोंको छोडकर प्रसन्न- मनसे उसके पीछे २ गये । यह अच्छा ही कहा है कि- एकाकी गृहसंत्यक्तः पाणिपात्री दिगम्बरः । सोऽपि संवाह्यते लोके तृष्णया पश्य कौतुकम् ॥ १५ ॥ जो इकळा गृहशून्य हाथरूपी पात्रवाला दिगम्बर ( नग्न है ) वहभी संसारमें तृष्णासे हरण होता है इस कौतुकको देखो ॥ १५ ॥ जीर्य्यन्ते जीर्य्यतः केशा दन्ता जीर्य्यन्ति जीर्य्यतः । चक्षुः श्रोत्रे च जीर्य्येते तृष्णैका तरुणायते ॥ १६ ॥ बूढ़े होनेसे बाल जीर्ण होजाते हैं, जीर्ण होनेसे दातभी जीर्ण होजाते हैं नेत्र और कानभी जीर्ण होजाते हैं एक तृष्णाही तरुण होती जाती है ॥ १६ ॥ अपरं गृहमध्ये तान् प्रवेश्य द्वारं निभृतं विधाय लगुड- प्रहारैः शिरसि अताडयत्, तेऽपि ताड्यमाना एके मृताः अन्ये भिन्नमस्तकाः फूत्कर्त्तुम् उपचक्रमिरे । अत्रान्तरे तमा- क्रन्दम् आकर्ण्य कोटरक्षपालैः अभिहितं,-"भो भोः ! किम् अयं महान् कोलाहलो नगरमध्ये ? तद्गम्यतां गम्यताम्" । ते च सर्वे तदादेशकारिणः तत्सहिता वेगात् तद्गृहं गताः तावत् रुधिरप्लावितदेहाः पलायमाना नग्नका दृष्टाः । तैः स नापितो बद्धः । हतशेषैः सह धर्माधिष्ठानं नीतः । तैः नापितः

( ४६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४६२ ) पञ्चतन्त्रम् । पृष्टः-“भोः ! किमेतत् भवता कुकृत्यमनुष्ठितम् ?” स आह,-“किं करोमि ? मया श्रेष्ठिमणिभद्रगृहे दृष्ट एवंविधो व्यतिकरः” । सोऽपि सर्वमणिभद्रवृत्तान्तं यथादृष्टम् अक- थयत् । ततः श्रेष्ठिनम् आहूय भणितवन्तः,-“भोः श्रेष्ठिन् ! किं त्वया कश्चित् क्षपणको व्यापादितः ?” ततः तेनापि सर्वः क्षपणकवृत्तान्तः तेषां निवेदितः। अथ तैः अभिहितम्- तब घरमें उनको प्रवेश कराकर द्वार बंद कर उनके शिरमें डंडेसे प्रहार करने लगा । वे भी ताडित हुए कोई मरगये कोई शिरफूटनेसे चिल्लाते हुए भागे, इसी समय उनके चिल्लानेके शब्दको सुनकर नगरके रक्षकों ने कहा-“भो भो यह नगरके मध्यमें क्या बडा कोलाहल है सो जाओ जाओ” । वे सब उन की आज्ञा करते उद्यके सहित वेगसे उस घरमें गये । उन्होंने रुधिरसे भीजे शरीर भागते हुए क्षपणकोंको देखा । तब उन्होंने उस नाईको बांध लिया । और मरनेसे बचे हुओंके साथ न्यायालयमें प्राप्त किया । तब उन्होंने नाईसे पूछा-“भो ! यह क्या है ? तैने बडा कुकृत्य किया है ?” वह बोला-“मैं क्या करूं ? मैने सेठ मणिभद्रके घरमें इस प्रकारका व्यापार देखा था”। और वह सब मणिभद्रके दृष्टान्तको जैसा देखा था तैसा कहता भया । तब वे श्रेष्ठीको बुलाकर कहते भये-“भो सेठ ! क्या तैने किसीक्षपणकको मारा ?” तब उसने सब क्षपणकका वृत्तान्त उनसे कहा । तब उन्होंने कहा,- “अहो ! शूलम् आरोप्यताम् असौ दुष्टात्मा कुपरीक्षित- कारी नापितः” । तथा अनुष्ठिते तैः अभिहितम्- “अहो इस दुरात्माको शूलपर आरोपण करदो यह दुष्टात्मा नाई कुपरीक्षित करनेवाला है” । ऐसा करनेपर उन्होंने कहा,- “कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् । तन्नरेण न कर्त्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥ १७ ॥ “जो बुरा देखा, कुत्सित जाना, कुत्सित सुना, कुत्सित परीक्षा कियाहुआ है मनुष्यको वह बात नहीं करनी चाहिये जो नाईने किया ॥ १७ ॥ अथवा साधु इदमुच्यते- अथवा यह अच्छा कहा है-

मणिभद्र बोला,-"यह कैसी कथा ?" वे धर्माधिकारी बोले-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४६३ ) अपरीक्ष्य न कर्तव्यं कर्तव्यं सुपरीक्षितम् । पश्चाद्भवति सन्तापो ब्राह्मण्यां नकुलार्थतः ॥ १८ ॥" कोई काम बिना परीक्षासे न करना चाहिये, परीक्षासेही करना चाहिये, बिना- विचारे सन्ताप होता हे, जैसे ब्राह्मणीको नकुलके निमित्त हुआ था ॥ १८ ॥" मणिभद्र आह,-"कथमेतत् ?" ते धर्माधिकारिणः प्रोचुः- मणिभद्र बोला,-"यह कैसी कथा ?" वे धर्माधिकारी बोले- कथा २. कस्मिंश्चिदधिष्ठाने देवशर्मा नाम ब्राह्मणः प्रतिवसति स्म । तस्य भार्या प्रसूता सुतम् अजनयत,तस्मिन् एव दिने नकुली नकुलं प्रसूता । अथ सा सुतवत्सला दारकवत्तमपि नकुलं स्तन्यदानाभ्यङ्गमर्दनादिभिः पुपोष । परं तस्य न विश्व- सिति "यत् कदाचित् एष स्वजातिदोषवशात् अस्य दार- कस्य विरुद्धम् आचरिष्यति" इति, एवं जानाति स्वचित्ते । उक्तञ्च- किसी स्थानमें देवशर्मा नाम ब्राह्मण रहता था उसकी भार्याने पुत्र उत्पन्न किया । उसी दिन नोलीने एक नकुलको उत्पन्न किया । वह पुत्रवत्सला बाल- ककी समान उस न्योलेकोभी दूध दान शरीरके मलनेआदिसे पुष्ट करती भई । परन्तु उसका विश्वास न करती कि "यह कदाचित् अपनी जातिके दोषसे इस बालकके विरुद्ध आचरण करेगा" ऐसा अपने चित्तमें जानती । कहा है- "कुपुत्रोऽपि भवेत्पुंसां हृदयानन्दकारकः । दुर्विनीतः कुरूपोऽपि मूर्खोऽपि व्यसनी खलः ॥ १९ ॥ "कुपुत्रभी पुरुषोंके हृदयके आनन्दका करनेवाला होता हे, चाहे दुर्विनीत कुरूप व्यसनी खल हो ॥ १९ ॥ एवं च भाषते लोकश्चन्दनं किल शीतलम् । पुत्रगात्रस्य संस्पर्शश्चन्दनादतिरिच्यते ॥ २० ॥ लोक यह कहते हैं कि, चन्दन शीतल हे परन्तु पुत्रका शरीर चन्दनसे अधिक शीतल हे परन्तु पुत्रके शरीरस्पर्शसे चंदन अधिक शीतल नहीं है ॥२०॥

( ४६४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४६४ ) पञ्चतन्त्रम् । सौहृदस्य न वाञ्छन्ति जनकस्य हितस्य च । लोकाः प्रपालकस्यापि यथा पुत्रस्य वन्धनम् ॥ २१ ॥" लोक मित्र पिता हितकारी पालकके बंधनकी इच्छा नहीं करतेहैं जैसे पुत्रके प्रणयबन्धनकी इच्छा करते हैं ॥ २१ ॥" अथ सा कदाचित् शय्यायां पुत्रं शाययित्वा जलकुम्भम् आदाय पतिमुवाच,-"ब्राह्मण ! जलार्थम् अहं तडागे या- स्यामि, त्वया पुत्रोऽयं नकुलात् रक्षणीयः" । अथ तस्यां गतायां पृष्ठे ब्राह्मणोऽपि शून्यं गृहं मुक्त्वा भिक्षार्थं क्वचित् निर्गतः । अत्रान्तरे दैववशात् कृष्णसर्पो बिलात् निष्क्रान्तः नकुलोऽपि तं स्वभाववैरिणं मत्वा भ्रातुः रक्षणार्थं सर्पेण सह युद्धा सर्पं खण्डशः कृतवान् । ततो रुधिराप्लावितवदनः सानन्दः स्वव्यापारप्रकाशनार्थं मातुःसन्मुखो गतः । मातापि तं रुधिरक्लिन्नमुखम् अवलोक्य शंकितचित्ता "यदनेन दुरा- त्मना दारको भक्षितः" इति विचिन्त्य कोपात् तस्योपरि तं जलकुम्भं चिक्षेप । एवं सा नकुलं व्यापाद्य यावत् प्रलपंती गृहे आगच्छति, तावत् सुतः तथैव सुतः तिष्ठति । समीपे कृष्णसर्प खण्डशः कृतम् अवलोक्य पुत्रवधशोकेन आत्म- शिरोवक्षस्थलं च ताडयितुम् आरब्धा । अत्रान्तरे ब्राह्मणो गृहीतनिर्वापः समायातो यावत् पश्यति, तावत् पुत्रशोका- भितप्ता ब्राह्मणी प्रलपति,-"भो भो लोभात्मन् ! लोभाभि- भूतेन त्वया न कृतं मद्वचः, तदनुभव साम्प्रतं पुत्रमृत्युदुःख- वृक्षफलम् । अथवा साधु इदमुच्यते,- तब वह कभी सेजमें पुत्रको सुला कर जलका घडा ले पतिसे बोली-"ब्राह्मण ! मैं जलके निमित्त सरोवरको जाती हूं तुम इस पुत्रकी नकुलसे रक्षा करना" । तब उसके जानेपर ब्राह्मणभी शून्य घरको छोडकर भिक्षाके निमित्त कहीं गया । इसी समय दैवयोगसे एक काला सांप बिलसे निकला । नौलाभी उसे स्वभाववैरी मानकर भ्राताकी रक्षाके निमित्त सर्पके संग युद्ध कर उस ( सर्प ) को खण्ड २ करता भया । तब रुधिरसे मुखरंगे आनन्दसे अपने व्यापारको

[Header] भाषार्टीकासमेतम् । ( ४६५ )

प्रकाश करनेके निमित्त माताके सम्मुख गया । माताभी रुधिरसे गीला उसका मुख देखकर शंकितचित्तसे “कि, इस दुरात्माने मेरा बालक खाया है” ऐसा विचार कर क्रोधसे उसके ऊपर वह जलका घडा फेंका । इस प्रकार वह नौले- को मारकर जबतक विलाप करती घरमें आई तबतक बालक सो रहा था । निकटही काले सर्पको टुकडे हुआ देखकर पुत्रवधके शोकसे अपना शिर वृक्षकी जडमें मारने लगी । इसी समय ब्राह्मण भिक्षा लेकर आय देखने लगा कि, पुत्रशोकसे ब्राह्मणी विलाप कर रही है । “भो ! भो ! लोभी ! लोभके कारण तैने मेरा वचन न किया । सो अब पुत्रकी मृत्युके दुखेरूपी वृक्षका फल भोग । अथवा अच्छा कहा है- अतिलोभो न कर्त्तव्यो लोभं नैव परित्यजेत् । अतिलोभाभिभूतस्य चक्रं भ्रमति मस्तके ॥ २२ ॥” अति लोभ नहीं करना चाहिये और सर्वथा लोभ त्यागन भी न करे, अति लोभी मनुष्यके मस्तकपर चक्र घूमता है ॥ २२ ॥” ब्राह्मण आह,-“कथमेतत् ?” सा प्राह,- ब्राह्मण बोला-“यह कैसे ?” वह बोली-- कथा ३- कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः परस्परं मित्र- तां गता वसन्ति स्म, ते चापि दारिद्र्योपहताः परस्परं मन्त्रं चक्रुः “अहो ! धिक् इयं दारिद्रता । उक्तञ्च- किसी स्थानमें चार ब्राह्मणके पुत्र परस्पर मित्र रहते थे वे दारिद्रताको प्राप्त हो परस्पर विचार करने लगे । “अहो ! इस दारिद्रताको धिक्कार है । कहा है- वरं वनं व्याघ्रगजादिसेवितं जनेन हीनं बहुकण्टकावृतम् । तृणानि शय्या परिधानवल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीनजीवितम् ॥ २३ ॥ सिंह हाथियोंसे सेवित मनुष्योंसे हीन बहुत कांटोंसे युक्त वन बहुत अच्छा है, तृणकी शय्या और वल्कल वस्त्र उत्तम है, परन्तु बंधुओंके बीचमें धनहीन होकर जीना भला नहीं ॥ २३ ॥ ३०

( ४६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४६६ ) पञ्चतन्त्रम् । तथाच- और देखो- स्वामी द्वेष्टि सुसेवितोऽपि सहसा प्रोज्झन्ति सद्बान्धवा राजन्ते न गुणास्त्यजन्ति तनुजाः स्फारीभवन्त्यापदः । भार्या साधु सुवंशजापि भजते नो यान्ति मित्राणि च न्यायारोपितविक्रमाण्यपि नृणां येषां न हि स्याद्धनम् २४॥ जिन मनुष्योंके पास धन नहीं है अच्छी प्रकार सेवन करनेसे प्रभु उनका आदर नहीं करता है, सद्बान्धव उसको त्याग देते हैं, गुण उसके शोभित नहीं होते हैं, पुत्रत्याग देते हैं, आपत्ति विस्तारको प्राप्त होती हैं, सत्कुलमे उत्पन्न हुई भार्या भी उनको नहीं भजती है, नीतिमार्गसे पुरुषकारसे प्राप्त हुए मित्र भी उनके पास नहीं आते हैं ॥ २४ ॥ शूरः सुरूपः सुभगश्च वाग्मी शस्त्राणि शास्त्राणि विदांकरोति । अर्थं विना नैव यशश्च मानं प्राप्नोति मर्त्योऽत्र मनुष्यलोके ॥ २५ ॥ शूर, स्वरूपवान्, सुन्दर, वाचाल, शस्त्र तथा शास्त्रका जाननेवाला मनुष्य अर्थके बिना इस लोकमें यश तथा मानको प्राप्त नहीं होता है ॥ २५ ॥ तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव । अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव बाह्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत् ॥ २६ ॥ वही अविकल इन्द्री, वही नाम है, वही अप्रतिहत बुद्धि और वही वचन है, किन्तु वही पुरुष धनकी गरमीसे रहित हुआ क्षणमात्रमें सबसे पृथक् होता है यह विचित्र है ॥ २६ ॥ तद्गच्छामः कुत्रचित् अर्थाय,” इति संमन्त्र्य स्वदेशपुरं च स्वसुहृत्सहितं बान्धवयुतं गृहं च परित्यज्य प्रस्थिताः, अथवा साधु इदमुच्यते- सो कहीं धनप्राप्तिके निमित्त जांयगे”। ऐसा विचारकर अपने देश पुरको तथा सुहृद बांधवोके सहित घरको छोड़कर चले । अथवा यह अच्छा कहा है-

भाषाटीकासमेतम्। (४६७) सत्यं परित्यजति मुञ्चति बन्धुवर्गं शीघ्रं विहाय जननीमपि जन्मभूमिम् । सन्त्यज्य गच्छति विदेशमभीष्टलोकं चिन्ताकुलीकृतमतिः पुरुषोऽत्र लोके ॥ २७ ॥ सत्यको छोड बन्धुवर्गको त्यागकर तथा जननी और जन्मभूमिकोभी शीघ्र त्यागकर चिन्तासे व्याकुल हुआ पुरुष अभीष्ट लोक वा देशको जाता है ॥२७॥ एवं क्रमेण गच्छन्तोऽवन्तीं प्राप्ताः, तत्र सिपराजले कृत- स्नाना महाकालं प्रणम्य यावत् निर्गच्छन्ति, तावत् भैरवा- नन्दो नाम योगी सम्मुखो बभूव । ततस्तं ब्राह्मणोचितवि- धिना सम्भाव्य तेनैव सह तस्य मठं जग्मुः । अथ तेन ते पृष्टाः,-"कुतो भवन्तः समायाताः ? क्व यास्यथ ? किं प्रयो- जनम् ?" । ततः तैः अभिहितम्,-"वयं सिद्धियात्रिकाः तत्र यास्यामो यत्र धनाप्तिः मृत्युर्वा भविष्यतीति एष निश्चयः । उक्तञ्च- इस प्रकार वे क्रमसे जाते अवन्तिका पुरीमें प्राप्तहुए वहा सिप्रानदीके जलमें स्नानकर महाकालको प्रणामकर जब चलने लगे तबतक भैरवानन्द नाम योगी सामने आया । तब उस ब्राह्मणका उचित विधिसे सत्कारकर उसीके सग उसके मठको गये । तब उसने पूछा-"तुम काहसे आये हो ? । कहा जाओगे ? । क्या प्रयोजन है ?" तब इन्होंने कहा-" हमने कार्यसिद्धिके निमित्त यात्रा की है । जहा धन मिलेगा वहा जायगे चाहें मृत्यु होजाय यह निश्चय है । कहा है- दुष्प्राप्याणि बहूनि च लभ्यन्ते वाञ्छितानि द्रविणानि । अवसरतुलिताभिरलं तनुभिः साहसिकपुरुषाणाम् ॥ २८ ॥ साहसी पुरुषोंको यथा समयमें चेष्टा किये शरीरसे दुर्लभ और वाञ्छित यथेष्ट बहुतसे धन प्राप्त होते हैं (आर्यावृत्त) ॥ २८ ॥ तथाच- और देखो- पतति कञ्चिन्नभसः खाते पातालतोऽपि जलमेति । दैवमचिन्त्यं बलवद्बलवान्तु पुरुषकारोऽपि ॥ २९ ॥,

( ४६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४६८ ) पञ्चतन्त्रम् । कभी जल आकाशसे पुष्करिणी आदिमें पतित होता है, कभी पातालसे निकलता है, दैव अचिन्त्य और बलवान् है पुरुषकारमें यह बात नहीं (विफल) है ॥२९॥ अभिमतासिद्धिरशेषा भवति हि पुरुषस्य पुरुषकारेण । दैवमिति यदपि कथयसि पुरुषगुणः सोऽप्यदृष्टाख्यः॥३०॥ पुरुषकारसे पुरुषको सम्पूर्ण मनोरथ सिद्धि मिलती है और जो दैवको कहता है वहभी पुरुषका अदृष्ट नामक गुण है ॥ ३० ॥ भयममुलं गुरुलोकात्तृणमिव तुलयन्ति साधु साहिसकाः। प्राणानद्भुतमेतच्चरितं चरितं ह्युदाराणाम् ॥ ३१ ॥ साहसी पुरुष गुरुजनोंसे अतुल भय तथा प्राणोंको तृणकी समान मानते हैं महान् पुरुषोंका यह अद्भुत चरित्र है ॥ ३१ ॥ क्लेशस्याङ्गमदत्त्वा सुखमेव सुखानि नेह लभ्यन्ते । मधुभिन्मथनायस्तैराश्लिष्यति बाहुभिर्लक्ष्मीम् ॥ ३२ ॥ इस संसारमें शरीरको बिना क्लेश दिये सुखकी प्राप्ति नहीं होती है मधुसूद- नने समुद्रमथनसे श्रान्तहुए भुजाओं द्वाराही लक्ष्मीकी प्राप्ति की थी ॥ ३२ ॥ तस्य कथं न चला स्यात्पत्नी विष्णोर्नृसिंहकस्यापि। मासांश्चतुरो निद्रां यः सेवति जलगत्तः सततम् ॥ ३३ ॥ नृसिंहरूपधारी उन विष्णुकी लक्ष्मी क्यों चलायमान नहो जो जलमें स्थित हो चार महीने निरन्तर निद्रा सेवन करते हैं ॥ ३३ ॥ दुरधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण साहसं न कृतम् । जयति तुलामधिरूढो भास्वानिह जलदपटलानि ॥३४॥ जबतक पुरुष साहस नहीं करता तबतक पराया भाग दुर्लभ है तुला (राशि) को प्राप्त होकरही सूर्य मेघसमूहोंको जीतता है ॥ ३४ ॥ तत्कथ्यताम् अस्माकं कंश्चित् धनोपायो विवरप्रवेशशा- किनीसाधनश्मशान सेवन महामांस विक्रयसाधकवर्त्तिप्रभृती- नामेकतम इति । अद्भुतशक्तिर्भवान् श्रूयते । वयमपि अति- साहसिकाः । उक्तञ्च- सो कोई हमको धनप्राप्तिका उपाय कहो, पातालगमन, शाकिनीसाधन, श्मशानसेवन, महामांसविक्रय, साधकवर्ति आदिमें कोई एक (विधि बताओ) आप अद्भुत शक्तिवाले सुने जाते हो । हमभी बडे साहसी हैं । कहा है-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४६९ ) महान्त एव महतामर्थं साधयितुं क्षमाः । ऋते समुद्रादन्यः को बिभर्त्ति वडवानलम् ॥ ३५ ॥" महान् पुरुषही महान् अर्थोंको साधनेमें समर्थ होते हैं समुद्रके बिना वडवा- नल धारण करनेको कौन समर्थ हो सकता है ? ॥ ३५ ॥" भैरवानन्दोऽपि तेषां सिद्ध्यर्थं बहूपायं सिद्धवर्त्तिचतुष्टयं कृत्वा अर्पयत् । आह, च-"गम्यतां हिमालयदिशि, तत्र सम्प्राप्तानां यत्र वर्त्तिः पतिष्यति, तत्र निधानम् असन्दिग्धं प्राप्स्यथ, तत्र स्थानं खनित्वा निधिं गृहीत्वा व्याघुष्य- ताम्” । तथा अनुष्ठिते तेषां गच्छताम् एकतमस्य हस्ताद्व- र्त्तिर्निपपात । अथ असौ यावत् तं प्रदेशं खनति तावद् ताम्रमयी भूमिः । ततः तेन अभिहितम्-"अहो ! गृह्यतां स्वेच्छया ताम्रम्” । अन्ये प्रोचुः, - "भो मूढ ! किमनेन क्रियते ? तत् प्रभृतमपि दारिद्र्यं न नाशयति । तदुत्तिष्ठ अग्रतो गच्छामः” । सोऽब्रवीत्,- “यान्तु भवन्तो न अहमग्रे यास्यामि” । एवम् अभिधाय ताम्रं यथेच्छया गृहीत्वा प्रथमो निवृत्तः । ते त्रयोऽपि अग्रे प्रस्थिताः । अथ किञ्चि- न्मात्रं गतस्य अग्रेसरस्य वर्त्तिः निपपात । सोऽपि यावत् खनितुम् आरब्धः तावत् रूप्यमयी क्षितिः । ततः प्रहर्षितः प्राह, - "यत् भो ! गृह्यतां यथेच्छया रूप्यम् । न अग्रे गन्त- व्यम्” । तौ ऊचतुः-"भोः ! पृष्ठतः ताम्रमयी भूमिरग्रतो रूप्यमयी । तत् नूनम् अग्रे सुवर्णमयी भविष्यति । तदनेन प्रभूतेनापि दारिद्र्यनाशो न भवति । तत् आवाम् अग्रे या- स्यावः” । एवमुक्त्वा द्वौ अपि अग्रे प्रस्थितौ । सोऽपि स्वशक्त्या रूप्यम् आदाय निवृत्तः । तयोरपि गच्छतोः एकस्य अग्रे वर्त्तिः पपात । सोऽपि प्रहृष्टो यावत् खनति तावत् सुवर्ण- भूमिं दृष्ट्वा द्वितीयं प्राह,-"भो ! गृह्यतां स्वेच्छया सुवर्णम् सुवर्णादन्यत् न किञ्चित् उत्तमं भविष्यति” । स प्राह,- "मूढ ! न किञ्चित् वेत्सि । प्राक् ताम्रं, ततो रूप्यं, ततः

( ४७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४७० ) पञ्चतन्त्रम् । सुवर्णं, तन्नूनमतः परं रत्नानि भविष्यन्ति येषाम् एकतमे- नापि दारिद्र्यनाशो भवति । तदुत्तिष्ठ अग्रे गच्छावः । किम- नेन भारभूतेनापि प्रभूतेन” । स आह,-“गच्छतु भवान् ! अहमत्र स्थितस्त्वां प्रतिपालयिष्यामि” । तथानुष्ठिते सोऽपि गच्छन् एकाकी ग्रीष्मार्कप्रतापसन्तप्ततनुः पिपासाकुलितः सिद्धिमार्गच्युत इतश्चेतश्च बभ्राम । अथ भ्राम्यन् स्थलोपरि पुरुषमेकं रुधिरप्लावितगात्रं भ्रमच्चक्रमस्तकमपश्यत् । ततो द्रुततरं गत्वा तम् अवोचत्,-“भोः ! को भवान् ? किमेवं चक्रेण भ्रमता शिरसि तिष्ठसि ? । तत्कथय मे यदि कुत्र- चित् जलमस्ति ?” । एवं तस्य प्रवदतः तच्चक्रं तत्क्षणात् तस्य शिरसो ब्राह्मणमस्तके चटितम् । स आह--“भद्र ! किमेतत् ?” स आह,-“मन्ममापि एवमेव एतत् शिरसि चटितम्” । स आह-“तत्कथय, कदा एतत् उत्तरिष्यति ? । महती मे वेदना वर्त्तते” । स आह,-“यदा त्वमिव कश्चिद् धृतसिद्धिवर्त्तिः एवमागत्य त्वाम् आलापयिष्यति तदा तस्य मस्तके चटिष्यति” । आह,-“कियान् कालस्तव एवं स्थि- तस्य?” । स आह,-“साम्प्रतं को राजा धरणीतले ?” स आह,-“वीणावत्सराजः”। स आह,-“अहं तावत् कालसं- ख्यां न जानामि । परं यदा रामो राजा आसीत् तदाहं दारिद्र्योपहतः सिद्धिवर्त्तिमादाय अनेन पथा समायातः । ततो मया अन्यो नरो मस्तकधृतचक्रो दृष्टः पृष्टश्च । ततश्च एतत् जातम्” । स आह,-“भद्र ! कथं तव एवं स्थितस्य भोजनजलप्राप्तिः आसीत् ?” । स आह,-“भद्र ! धनदेन निधानहरणभयात् सिद्धानामेतत् भयं दर्शितं तेन कश्चिदपि न आगच्छति । यदि कश्चित् आयाति स क्षुत्पिपासानिद्रा- रहितो जरामरणवर्जितः केवलमेवं वेदनाम् अनुभवतीति । तदाज्ञापय मां स्वगृहाय,” इत्युक्त्वा गतः । अथ तस्मिन् चि- रयति स सुवर्णसिद्धिः तस्य अन्वेषणपरः तत्पदपंक्त्या यावत्

भाषाटीकासमेतम् । (४७१)

किञ्चित् वनान्तरम् आगच्छति तावत् स रुधिरप्लावितश- रीरः तीक्ष्णचक्रेण मस्तके भ्रमता सबेदनः क्वणन् उपविष्टः तिष्ठति। तत्समीपवर्तिना भूत्वा सबाष्पं पृष्टः- "भद्र ! किमे- तत् ?" स आह,-विधिनियोगः"। स आह,-"कथं तत् कथय कारणमेतस्य"। सोऽपि तेन पृष्टः सर्वं चक्रवृत्तान्तम् अकथयत् । श्रुत्वा असौ तं विगर्हयन् इदमाह । "भो ! नि- षिद्धः त्वं मया अनेकशो न शृणोषि मे वाक्यम् । तत् किं क्रियते ! विद्यावानपि कुलीनोऽपि बुद्धिरहितः। अथवा साधु इदमुच्यते- भैरवानन्दभी उनकी सिद्धिके निमित्त बहुतसे उपाय सोच चार सिद्ध वत्तीं बनाकर अर्पण करता हुआ । और बोला-"हिमालयकी ओर जावो । वहां जानेमें जहा बत्ती गिरजाय, वहा अवश्य धनको प्राप्त होगे वह स्थान खोदकर धन ग्रहण कर प्रकाश करोगे" ऐसा करनेपर जाते हुए उनमेसे एकके हाथसे बत्ती गिर पडी, तब वह उस स्थानको खोदने लगा तो ताम्रमयी भूमि दृष्टिगोचर हुई । तब उसने कहा-"अहो ! अपनी इच्छासे ताम्रग्रहण करो"। और बोले"रे मूढ ! इसे लेकर क्या करेंगे । बडा दरिद्र तो नाश न होगा । सो उठो आगे चलो"। वह बोला,-"तुम जाओ मै तो आगे न जाऊगा" । ऐसा कह यथेच्छ ताम्र ग्रहण कर पहला निवृत्त हुआ वे तीन आगे चले । तब कुछ दूर आगे चलकर और वत्ती गिरी । वहभी जब खोदने लगा तब चादी- की भूमि मिली । तब प्रसन्न होकर बोला-"भो ! यथेच्छ चादी ग्रहण करो आगे मत चलो" वह बोले-"भो ! पीछे ताम्रमयी भूमी यहा चांदीकी । सो अवश्य आगे सुवर्णकी भूमी होगी। सो इस बहुतसेभी दरिद्र नाश न होगा सो हम दोनो आगे जाते हैं" ऐसा कहकर दोनों आगे चले । वहभी अपनी शक्तिसे चादीको लेकर निवृत्त हुआ । उन दोनोंके चलनेपर आगे फिर बत्ती गिरी । वह प्रसन्न होकर जब खोदने लगे तब सुवर्णभूमिको देख दूसरेसे बोला-"भो ! अपनी इच्छासे सुवर्ण ग्रहण करो । सुवर्णसे और कुछ उत्तम न होगा" । वह बोला-"मूर्ख ! तू कुछ नहीं जानता पहले तावा फिर चादी फिर सोना, अब इसके आगे अवश्य रत्न होंगे । जिनके पानेमें एकसेही दरिद्रका नाश होजायगा ।

( ४७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सो उठ आगे चलें, इस महाबोझके धारणसे क्या" । वह बोला-"जाओ मैं यहीं बैठा तुम्हारी वाट देखता हूं" । ऐसा कहनेपर वहभी इकला जाता हुआ गरमीके सूर्यतापसे तप्त शरीर हुआ प्याससे व्याकुल हो सिद्धपथसे भ्रष्ट हो इधर उधर घूमने लगा । तब घूमता हुआ स्थलके ऊपर एक पुरुषको रुधिरसे प्लावित शरीर मस्तकपर चक्र घूमता हुआ देखा सो बहुत शीघ्र जाकर उससे बोला-"भो ! आप कौनहो ? किस प्रकार शिरेंपेर चक्र घूमते हुए तुम स्थित हो ? सो बताओ मुझे यदि कहीं जल हो तो" ऐसा उसके कहतेही उसी क्षण उसके शिरसे ( वहचक्र ) ब्राह्मणके शिरमें पतित हुआ, वह बोला-"भद्र ! यह क्या है ? जो मेरेभी यह शिरपर पडने लगा । सो कहो यह कब उतरेगा ? । मुझे बडा दुःख है"। वह बोला-"जब तेरीसमान कोई सिद्धवर्ती हाथमें लिये आकर तुझसे बात करेगा, तब यह उसके मस्तकपर पतित होगा"। वह बोला- "यहां रहते तुझको कितना समय हुआ ?" वह बोला-"इस समय पृथ्वीतलमें कौन राजा है?" वह बोला-"वीणावत्स राजा है"। वह बोला-"मैं कालसंख्याको तो नहीं जानता । परन्तु जब राम राजाथे तब मैं दरिद्रताके कारण सिद्धवर्त्ती लेकर इस मार्गसे आया था । तब मैंने और एक मनुष्य जिसके मस्तकपर चक्र घूमता था देखकर उससे पूछा । तब मेरे ऐसा होगया" । वह बोला-"भद्र ! किस प्रकार तुम्हें यहां जल और भोजनकी प्राप्ति होती है" वह बोला-"भद्र ! कुबेरने धन हरणके भयसे सिद्धोंको यह भय दिखाया है । जिससे कोई भी यहां नहीं आता है और यदि कोई आता है तो क्षुधा पिपासा निद्रासे रहित जरामरणसे रहित हो केवल वेदनाको अनुभव करता है । सो मुझे घर जानेकी आज्ञादो" ऐसा कहकर गया । तब उसको देर होनेपर वह सुवर्णसिद्धि उसको ढूंढता हुआ उसकी पद पंक्तिसे जबतक कुछ वनान्तरमें जाता है, तबतक उसको रुधिरसे प्लावितशरीर तीक्ष्ण चक्र मस्तकपर घूमता वेदनासे व्याकुल विलाप करते हुए बैठा पाया । उसके समीपवर्ती हो आंखोंमें आंसू भरकर उसने पूछा-"भद्र ! यह क्या है" ? उसने कहा-"प्रारब्धका नियोग है" वह बोला- "कैसे" ? वह उससे पूछा हुआ सम्पूर्ण चक्रके वृत्तान्तको कहता हुआ । यह सुन वह इसकी निन्दा करता हुआ इस प्रकार बोला,-"भो ! मैंने अनेकवार निषेध किया परन्तु तैने मेरा वचन न सुना । सो क्या किया जाय । विद्यावान् कुलीन भी बुद्धिरहित होता है । अथवा अच्छा कहा है-

चक्रधर बोला,-“यह कैसी कथा ?” सुवर्णसिद्धि बोला-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४७३) वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा । बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः ॥ ३६ ॥ बुद्धि अच्छी है वैसी विद्या अच्छी नहीं बुद्धिहीन मनुष्य सिंहकारकोंकी समान नष्ट होते हैं ॥ ३६ ॥ चक्रधर आह-“कथमेतत् ?” सुवर्णसिद्धिः आह- चक्रधर बोला,-“यह कैसी कथा ?” सुवर्णसिद्धि बोला- कथा ४. कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः परस्परं मित्र- भावम् उपगता वसन्ति स्म । तेषां त्रयः शास्त्रपारंगताः परन्तु बुद्धिरहिताः । एकस्तु बुद्धिमान्, केवलं शास्त्रपराङ्- मुखः। अथ तैः कदाचित् मित्रैः मन्त्रितम् । “को गुणो विद्या- या येन देशान्तरं गत्वा भूपतीन् परितोष्य अर्थोपार्जना न क्रियते ? तत्पूर्वदेशं गच्छामः” । तथानुष्ठिते किञ्चिन्मार्गे गत्वा तेषां ज्येष्ठतरः प्राह,-“अहो ! अस्माकमेकः चतुर्थो मूढः केवलं बुद्धिमान् । न च राजप्रतिग्रहो बुद्ध्या लभ्यते विद्यां विना । तन्न अस्मै स्वोपार्जितं दास्यामि । तद्गच्छतु गृहम्” । ततो द्वितीयेन अभिहितम्-“भो सुबुद्धे ! गच्छ त्वं स्वगृहं यतः ते विद्या नास्ति” । ततः तृतीयेन अभिहि- तम्,-“अहो ! न युज्यते एवं कर्तुं यतो वयं बाल्यात् प्रभृति एकत्र क्रीडिताः तत् आगच्छतु महानुभावोऽस्मदुपार्जितवि- त्तस्य समभागी भविष्यतीति । उक्तञ्च- किसी स्थानमें चार ब्राह्मणके पुत्र परस्पर मित्रभावको प्राप्त हुए रहते थे । उनमें तीन तो शास्त्रके पारगामी थे परन्तु बुद्धिहीन थे । एक उनमे बुद्धिमान् केवल शास्त्रसे पराङ्मुख था । तब उन मित्रोंने एक समय सम्मति करी । “विद्यासे क्या गुण है जिससे देशान्तरमें जाकर राजोंको सन्तुष्ट करके धन उपार्जन न किया जाय । सो पूर्व देशको चलैं । ऐसा कहकर कुछ मार्गमें जाकर उनमें ज्येष्ठतर बोला,-“अहो हममें एक ही चौथा मूढ केवल बुद्धिमान् परन्तु राजासे भेट केवल बुद्धिसे विद्याके बिना प्राप्त नहीं होती । सो हम इसको अपना

( ४७४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४७४ ) पञ्चतन्त्रम् । उपार्जन किया न देंगे । सो घर जाओ" । तब दूसरेने कहा-"भो सुबुद्धे ! तुम अपने घरको जाओ कारण कि तुमको विद्या नहीं है" । तब तीसरेने कहा-"ऐसा करनेको तुम योग्य नहीं हो हम बालकपनसे एक स्थानमें खेले हैं । सो आप महानुभाव आइये हमारे उपार्जन किये धनके समान भागी होंगे- किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला । या न वेश्येव सामान्या पथिकैरुपभुज्यते ॥ ३७ ॥ कहा है उस लक्ष्मीसे क्या करें जो केवल वधूकी समान है और जो साधारण वेश्याकी समान पथिकोंसे नहीं भोगी जाती है ॥ ३७ ॥ तथाच- और देखो- अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ ३८ ॥ यह हमारा है यह पराया यह लघुचित्तवालोंकी गणना है । और उदार चरित्रवालोंको वसुधाभर कुटुम्ब है ॥ ३८ ॥ तदागच्छतु एषोऽपि" इति । तथा अनुष्ठिते तैः मार्गा- श्रितैः अटव्यां मृतसिंहस्य अस्थीनि दृष्टानि । ततश्च एकेन अभिहितम्,-"अहो ! अद्य विद्याप्रत्ययः क्रियते । किञ्चिदे- तत् सत्वं मृतं तिष्ठति, तद्विद्याप्रभावेण जीवनसहितं कुर्मः, अहम् अस्थिसञ्चयं करोमि" ततश्च एकेन औत्सुक्यात् अस्थिसञ्चयः कृतः । द्वितीयेन चर्ममांसरुधिरं संयोजितम् । तृतीयोऽपि यावज्जीवनं सञ्चारयति तावत् सुबुद्धिना नि- षिद्धः । "भोः ! तिष्ठतु भवान्, एष सिंहो निष्पाद्यते यदि एनं सजीवं करिष्यसि ततः सर्वानपि व्यापादयिष्यति" । इति तेन अभिहितः स "धिक् मूर्ख ! नाहं विद्याया विफ- लतां करोमि" । ततः तेनाभिहितम्-"तर्हि प्रतीक्षस्व क्षणं यावदहं वृक्षमDictारोहामि" तथानुष्ठिते यावत् सजीवः कृतः तावत् ते त्रयोऽपि सिंहेन उत्थाय व्यापादिताः स च पुनः वृक्षात् अवतीर्य्य गृहं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४७५ ) सो यहभी चले” । ऐसा करनेपर उन बटोहीयोंने जङ्गलमे मरे सिंहकी हड्डी देखी । तब एकने कहा-“अहो ! आज विद्याकी परीक्षा करे । कोई यह जीव मृतक हुआ स्थित है । सो विद्याके प्रभावसे इसको जीवित करें । मैं अस्थिस- चय करूं” । तब एकने उत्कठासे अस्थिसंचय की । दूसरेनें ( मन्त्रसे ) चर्म मास रुधिरसे युक्त किया । तीसराभी जबतक उसको जीवित करने लगा । तबतक सुबुद्धिने निषेध किया-‘भो ! आप ठहरो । यह सिंह निर्मित किया जाता है । जो इसे जीवित करोगे तो यह सबको नष्टकर देगा” । इस प्रकार उसके कहनेपर वह बोला,-‘धिक् मूर्ख ! मैं विद्याको विफल नहीं करूंगा” । तब उसने कहा-“तो क्षणमात्र प्रतीक्षा करो जबतक मैं वृक्षपर चढ जाऊं” । ऐसा करनेपर जभी उन्होंने उसे जिलाया तबतक उन तीनोंको उठकर सिंहने मारडाला । और वह फिर वृक्षसे उतरकर घर गया । इससे मैं कहता हू- वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा । बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः ॥ ३९ ॥ बुद्धि अच्छी है विद्या नहीं विद्यासे बुद्धि श्रेष्ठ है बुद्धिहीन पुरुष सिंह बना- नेवालोकी समान नष्ट होते हैं ॥ ३९ ॥ अतः परमुक्तञ्च- औरभी कहा है- अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचारविवर्जिताः । सर्वे ते हास्यतां यांति यथा ते मूर्खपण्डिताः ॥ ४० ॥” शास्त्रमें भी कुशल लोकाचारसे हीन सब वे मूर्खपंडितोकी समान हास्यताको प्राप्त होते हैं ॥ ४० ॥” चक्रधर आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्- चक्रधर बोला-“यह कैसे ?” वह बोला- कथा ५. कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणाः परस्परं मित्र- त्वम् आपन्ना वसन्ति स्म । बालभावे तेषां मतिः अजायत । “भो ! देशान्तरं गत्वा विद्याया उपार्जनं क्रियते” । अथ अन्यस्मिन् दिवसे ब्राह्मणाः परस्परं निश्चयं कृत्वा विद्योपा

( ४७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

[Header] ( ४७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

र्जनार्थं कान्यकुब्जे गताः, तत्र च विद्यामठे गत्वा पठन्ति । एवं द्वादशाब्दानि यावत् एकचित्ततया विद्याकुशलास्ते सर्वे सञ्जाताः । ततः तैः चतुर्भिर्मिलित्वा उक्तम्-“वयं सर्व- विद्यापारे गताः । तदुपाध्यायम् उत्कलापयित्वा स्वदेशे गच्छामः”।”तथैव क्रियताम्” इत्युक्ता ब्राह्मणा उपाध्याय- मुत्कलापयित्वा अनुज्ञां लब्ध्वा पुस्तकानि नीत्वा प्रचलिताः। यावत् किञ्चित् मार्गं यान्ति तावत् द्वौ पन्थानौ समायातौ । उपविष्टाः सर्वे । तत्रैकः प्रोवाच,–“केन मार्गेण गच्छामः ?” एतस्मिन् समये तस्मिन् पत्तने कश्चित् वणिक्पुत्रो मृतः तस्य दाहार्थे महाजनो गतोऽभूत् । ततः चतुर्णां मध्यात् एकेन पुस्तकम् अवलोकितम्-“महाजनो येन गतः स पन्थाः” इति “तत् महाजनमार्गेण गच्छामः” । अथ ते पण्डिता यावत् महाजनमेलापथिकेन सह यान्ति तावत् रासभः कश्चित् तत्र श्मशाने दृष्टः । अथ द्वितीयेन पुस्तकम् उद्घाट्य अवलोकितम्- किसी स्थानमें चार ब्राह्मण परस्पर मित्र रहतेथे । बालकभावमेंही उनकी यह बुद्धि हुई कि,–“भो ! देशान्तरमें जाकर विद्या उपार्जन करना चाहिये”। तब और दिन वे ब्राह्मण परस्पर निश्चय करके विद्या उपार्जनके निमित्त कन्नो- जको गये । वहां विद्यालयमें जाकर पढने लगे । इस प्रकार बारह वर्षमें एक चित्तसे विद्या पढनेमें ये सब विद्यामें कुशल हुए । तब उन चारोंने मिलकर कहा- “हम सब विद्याके पार हुए सो उपाध्यायको संतुष्ट कर अपने देशको जांय” । “ऐसाही करो” यह कहकर वे ब्राह्मण उपाध्यायको सन्तुष्ट कर उनकी आज्ञा लेकर पुस्तकें लेकर चले । जबतक कुछ मार्गमें जाते हैं कि तबतक दो मार्ग आये । सब बैठ गये । उनमें एक बोला,-“किस मार्गसे जांय ?” । इसी समय उस नगरमें कोई वणिक्पुत्र मरगया । उसके दाहके निमित्त महाजन जाते थे । तब चारोंके बीचमें एकने पुस्तक खोल कर कहा--“जिसमें बहुतसे लोग गमन करते हैं वही मार्ग है इससे महाजनोंके मार्गसे गमन करें” । तब वे महाजन जब महाजनके संग मार्गमें जाने लगे । तबतक श्मशानमें कोई गधा देखा । तब दूसरेने पुस्तक खोलकर देखा कि-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४७७ ) “उत्सवे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥ ४१ ॥ “उत्सव, व्यसनप्राप्ति, दुर्भिक्ष, शत्रुसंकट, राजद्वार और श्मशानमें जो स्थित हो वह बन्धु है ॥ ४१ ॥ तत् अहो ! अयम् अस्मदीयो बान्धवः” । ततः कश्चित् तस्य ग्रीवायां लगति । कोऽपि पादौ प्रक्षालयति । अथ यावत् ते पण्डिताः दिशाम् अवलोकनं कुर्वन्ति तावत् कश्चित् उष्ट्रो दृष्टः । तैश्च उक्तम्,-“एतत् किम् ?” तावत् तृतीयेन पुस्तकम् उद्घाट्य उक्तम्,-“धर्मस्य त्वरिता गतिः” “एष धर्मस्तावत्” । चतुर्थेन उक्तम्,-“इष्टं धर्मेण योजयेत् ।” अथ तैश्च रासभ उष्ट्रग्रीवायां बद्धः केनचित् रजकस्य अग्रे कथि- तम् । यावत् रजकः तेषां मूर्खपण्डितानां प्रहारकरणाय समायातः तावत् ते प्रनष्टाः यावदग्रे किञ्चित् स्तोकं मार्गं यान्ति तावत् काचित् नदी समासादिता । तत् तस्या जल- मध्ये पलाशपत्रम् आयातं दृष्ट्वा पण्डितेन एकेन उक्तम्- सो अहो यह हमारा बंधु है” । सो कोई उसकी ग्रीवामें लगता है कोई चरण धोता है । तब ज्योंही वे पंडित दिशाओकी ओर देखते हैं तबतक कोई ऊंट देखा । उन्होंने कहा-“यह क्या है?” तब तीसरेने पुस्तक खोलकर कहा-“धर्मकी शीघ्र गति है” । “यह धर्म है” चौथेने कहा-“इष्टको धर्मके साथ संयुक्त करना चाहिये” । तब उन्होंने गधेको ऊंटकी गरदनमें बांधा । तब यह किसीने धोबीके आगे कहा सो जबतक वह धोबी उन मूर्ख पंडितोंको प्रहार करनेको आया । तबतक वे पलायन करगये । जबतक आगे किसी लघु मार्गको प्राप्त हुए कि तबतक कोई नदी मिली तब उसके जलमें ढाकका पत्र आया देखकर एक पंडितने कहा- “आगमिष्यति यत्पत्रं तदस्मांस्तारयिष्यति ।” “जो यह पत्र आ रहा है सो हमको तार देगा ।” एतत् कथयित्वा तत्पत्रस्य उपरि पतितो यावत् नद्या नीयते तावत् तं नीयमानम् अवलोक्य अन्येन पण्डितेन केशान्तं गृहीत्वा उक्तम्-

( ४७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४७८ ) पञ्चतन्त्रम् । ऐसे कह उस पत्रके ऊपर गिरे जबतक नदी उसे (पंडितको) बहा लेचली तबतक उसे बहता हुआ देख दूसरे पंडितने बाल पकड़कर कहा-- “सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्द्धं त्यजति पण्डितः । अर्द्धेन कुरुते कार्य्यं सर्वनाशो हि दुःसहः ॥ ४२ ॥” सर्वनाश उपस्थित होनेमे पंडित जन आधा त्यागदेते है आधेसेही कार्य करते है कारण कि सर्वनाश नहीं सहा जाता है ॥ ४२ ॥ इत्युक्त्वा तस्य शिरश्च्छेदो विहितः । अथ तैश्च पश्चात् गत्वा कश्चिद्ग्राम आसादितः । तेऽपि ग्रामीणैः निमन्त्रिताः पृथक् पृथक् गृहेषु नीताः । ततः एकस्य सूत्रिका घृतखण्डसं- युक्ता भोजने दत्ता । ततो विचिन्त्य पंण्डितेन उक्तम्--“यद्दी- र्घसूत्री विनश्यति”--एवमुक्त्वा भोजनं परित्यज्य गतः। तथा द्वितीयस्य मण्डका दत्ताः । तेनापि उक्तञ्च--“अतिविस्तार- विस्तीर्णं तद्भवेन्न चिरायुषम्” । स च भोजनं त्यक्त्वा गतः । अथ तृतीयस्य वटिकाभोजनं दत्तम् । तत्रापि पण्डितेन उक्तम्--“छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति”। एवं तेऽपि त्रयः पण्डि- ताः क्षुत्क्षामकण्ठा लोकैः हास्यमानाः ततः स्थानात् स्व- देशं गताः। अथ सुवर्णसिद्धिः आह--“यस्त्वं लोकव्यवहारम् अजानन् मया वार्य्यमाणोऽपि न स्थितः ततः ईदृशीमवस्थाम् उपगतः । अतोऽहं ब्रवीमि- ऐसा कह उसका शिर काट लिया । तब वह पीछे फिर कर किसी ग्राममें : पहुंचे । उन्हे ग्रामीण निमंत्रित कर पृथक् पृथक् अपने घर लेगये तब एकने सूत्रघृत खांड़से युक्त भोजनको दिया । तब विचार कर पंडितने कहा--“जो कि दीर्घसूत्री (आलसी) नष्ट होता है” । ऐसा कह भोजन त्याग कर गया । दूसरेने मण्ड (मिष्टान्न) दिया तब उसने कहा “अतिविस्तारसे विस्तीर्ण चिरायुके निमित्त नहीं होता है” । और वह भी भोजन त्याग कर चलागया । तीसरेने वटिका (पिष्टी) का भोजन दिया । वहां भी उस पांडेतने कहा--“छिद्र युक्त (पिष्टक) में बहुत अनर्थ होते हैं”। इस प्रकार वे तीनो पंडित भूखसे व्या- कुल लोकोंसे हंसीको प्राप्त हुए अपने देशोंको प्राप्त हुए । तब सुवर्णसिद्धि बोला--“जो कि तू लोकव्यवहारको न जानकर मुझसे निवारण किया हुआ भी न स्थित हुआ इस कारण ऐसी दशाको प्राप्त हुआ । इससे मैं कहता हूं-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४७९ ) अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचारविवर्जिताः । सर्वे ते हास्यतां यान्ति यथा ते मूर्खपण्डिताः ॥ ४३ ॥” कि, शास्त्रमे कुशल भी लोकाचार न जाननेके कारण उन मूर्ख पंडितोकी समान वे सभी हास्यताको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥” तत् श्रुत्वा चक्रधर आह–“अहो ! अकारणमेतत् । यह सुनकर चक्रधर बोला--“अहो ! यह तो अकारण है । बहुबुद्धयो विनश्यन्ति दुष्टदैवेन नाशिताः । स्वल्पबुद्धयोऽप्येकास्मिन् कुले नन्दन्ति सन्ततम् ॥ ४४ ॥ दुष्ट दैवसे नाशित होकर महाबुद्धिमान् भी नष्ट होते हैं और स्वल्पबुद्धिवाले भी एक कुलमे निरन्तर आनन्दको प्राप्त होते है ॥ ४४ ॥ उक्तञ्च- कहा है कि- अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति ॥ ४५ ॥ नहीं रक्षित किया दैवसे रक्षित होकर स्थित रहता है, भली प्रकार रक्षा किया हुआभी दैवसे हत होनेके कारण नष्ट हो जाता है, वनमे विसर्जन किया अनाथ भी जीता है, और यत्न करनेपर घरमें भी नही जीता ॥ ४५ ॥ तथाच- और देखो- शतबुद्धिः शिरस्थोऽयं लम्बते च सहस्रधीः । एकबुद्धिरहं भद्रे क्रीडामि विमले जले ॥ ४६ ॥” यह शतबुद्धि शिरपर है और यह सहस्रबुद्धि लटकता है हे भद्रे ! मै एक- बुद्धि हू जो उज्ज्वल जलमें क्रीडा करता हू ॥ ४६ ॥ सुवर्णद्धिः आह,-कथमेतत्” स आह,- सुवर्णसिद्धि बोला-“यह कैसे?” चक्रधर बोला-

(४८०) पञ्चतन्त्रम् ।

(४८०) पञ्चतन्त्रम् । कथा ६. कस्मिंश्चित् जलाशये शतबुद्धिः सहस्रबुद्धिश्च द्वौ मत्स्यौ निवसातः स्म। अथ तयोः एकबुद्धिर्नाम मण्डूको मित्रतां गतः। एवं ते त्रयोऽपि जलतीरे कञ्चित् कालं वेलायां सुभाषितसु- खम् अनुभूय भूयोपि सलिलं प्रविशन्ति । अथ कदाचित् तेषां गोष्ठीगतानां जालहस्तधीवराः प्रभूतैः मत्स्यैः व्यापादितैः मस्तके विधृतैः अस्तमनवेलायां तस्मिन् जलाशये समा- याताः। ततः सलिलाशयं दृष्ट्वा मिथः प्रोचुः- “अहो ! बहुम- त्स्योऽयं ह्रदो दृश्यते स्वल्पसलिलश्च । तत्प्रभाते अत्र आग- मिष्यामः”। एवमुक्त्वा स्वगृहं गताः । मत्स्याश्च विषण्ण- वदना मिथो । मन्त्रं चक्रुः ततो मण्डूक आह- “भोः ! शत- बुद्धे ! श्रुतं धीवरोक्तं भवता ? तत् किमत्र युज्यते कर्त्तुम् ! पलायनम् अवष्टम्भो वा ? यत्कर्त्तुं युक्तं भवति तत् आदिश्य- ताम् अद्य !” तत् श्रुत्वा सहस्रबुद्धिः प्रहस्य आह,- “भो मित्र ! मा भैषीर्यतो वचनस्मरणमात्रादेव भयं न कार्य्यम् । न भेतव्यम् । उक्तञ्च- किसी सरोवरमें शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि नामके दो मच्छ रहते थे । उनका एकबुद्धिनाम मेडक मित्र होगया । इस प्रकार वे तीनों ही जलके किनारे किसी कालतक सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव कर फिरभी जलमें प्रवेश कर जाते । कभी गोष्ठीमें प्राप्त होनेपर जाल हाथमें लिये धीमर बहुतसी मच्छियोंको मार- कर मस्तकपर धरे अस्तके 'समय उस सरोवरके निकट प्राप्त हुए । तब सरोव- रको देख परस्पर कहने लगे- “अहो ! यह ह्रद बहुत मछलियोंसे युक्त थोडे जलवाला है । सो प्रातःकाल यहां आवेंगे”। ऐसा कह अपने घर गये । तब मत्स्य व्याकुल हो परस्पर मंत्रणा करने लगे । तब मेडक बोला- “भो शतबुद्धि ! सुना तुमने धीमरोंका वचन ? सो अब क्या करना उचित है ? पलायन करना वा गुप्त होकर यहां रहना ? । जो करना उचित समझो वह अभी कहो?” यह सुन सहस्रबुद्धि हँसकर बोला,-- “मित्र ! डरो मत, वचनके स्मरण मात्रसेही भय न करना चाहिये, मत डरो । कहा है कि-