भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 497

( ४८२ ) पञ्चतन्त्रम् । न तत्स्वर्गेऽपि सौख्यं स्याद्दिव्यस्पर्शनशोभने । कुस्थानेऽपि भवेत्पुंसां जन्मनो यत्र सम्भवः ॥ ५० ॥ वह दिव्य स्पर्शसे शुभग स्वर्गमेभी सुख नहीं है जो सुख पुरुषोको कुत्सित जन्मस्थानमें भी होता है ॥ ५० ॥ तन्न कदाचिदपि गन्तव्यम् । अहं त्वां सुबुद्धिप्रभावेण रक्षिष्यामि” । मण्डूक आह,-"भद्रौ ! मम तावद् एका एव बुद्धिः पलायनपरा, तत् अहम् अन्यं जलाशयमैवैद सभार्यो यास्यानि”। एवमुक्त्वा स मण्डूको रात्रौ एव अन्य- जलाशयं गतः। धीवरैः अपि प्रभाते आगत्य जघन्यमध्यमो- त्तमजलचरा मत्स्यकूर्ममण्डूककर्कटादयो गृहीताः तौ अपि शतबुद्धिसहस्रबुद्धी सभार्यौ पलायमानौ चिरम् आत्मानं गतिविशेषविज्ञानैः कुटिलचारेण रक्षन्तौ जाले पतितौ व्या- पादितौ च । अथ अपराह्नसमये प्रहृष्टास्ते धीवराः स्वगृहं प्रति प्रस्थिताः । गुरुत्वात् च एकेन शतबुद्धिः स्कन्धे कृतः । सह- स्रबुद्धिः प्रलम्बमानो नीयते । ततश्च वापीकण्ठोपगतेन मंडू- केन तौ तथा नीयमानौ दृष्ट्वा अभिहिता स्वपत्नी-“प्रिये ! पश्य पश्य । सो किसी प्रकार डरना न चाहिये । मैं तुम्हारी अपनी बुद्धिके प्रभावसे रक्षा करूंगा”। मण्डूक बोला-“भद्रो! मेरी तो एकही बुद्धि पलायनमें है, सो मैं तो दूसरे जलाशयको अभी भार्याके सहित जाता हू, ऐसा कहकर वह मण्डूक रात्रिमेंही दूसरे जलाशयको चलागया । धीमरोंनेभी प्रातःकाल आकर निकृष्ट, मध्यम,उत्तम जलचर मत्स्य,कछुए,मेंडक, केंकड़े आदि पकड़े यह दोनोंभी शत- बुद्धि सहस्रबुद्धि भार्यासहित भागतेहुए बहुत समयतक अपनेको गतिविशेषके विज्ञान और कुटिलाचरणसे रक्षा करतेहुए अन्तमें जालमें पडकर मारेगये । तब : तीसरे प्रहरके समय प्रसन्न हुए वे धीमर अपने घरकी ओर चले । भारी होनेसे एकने शतबुद्धिको कंधेपर धरा, सहस्रबुद्धिकोभी लटकाकर लेचले । तब बाव- डीके समीप प्राप्तहुए मण्डूकने उनको इस प्रकार लेजाते देख अपनी स्त्रीसे कहा-“प्रिये ! देखो देखो !