पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४८४ ) पञ्चतन्त्रम् । “भो भगिनीसुत ! पश्य पश्य, अतीव निर्मला रजनी । तदहं गीतं करिष्यामि । तत् कथय कतमेन रागेण करोमि ?” स आह,—“माम! किमनेन वृथा अनर्थप्रचालनेन यतः चौरकर्म- प्रवृत्तौ आवां निभृतैश्च चौरजारैः अत्र स्थातव्यम् । उक्तञ्च- किसी स्थानमें उद्धत नाम गधा रहता था । वह सदा धोबीके घरमें बोझ उठाकर रात्रिको स्वेच्छासे पर्यटन करता । और प्रातःकालही बन्धनके भयसे स्वयं ही धोबीके घर आजाता । रजक भी उसको बन्धनमें न नियुक्त करता । तब उसके रात्रिमें घूमतेहुए क्षेत्रोंमें शृगालके साथ एक समय उसकी मित्रता होगई । वह पुष्ट होनेसे बाड़ तोड़कर ककड़ीके खेतमें शृगालसहित घुस जाता । इस प्रकार वे यथेच्छ ककड़ी भक्षण करते प्रतिदिन प्रातःकाल अपने स्थानको जाते । तब कभी उस मदोद्धत गधेने क्षेत्रके मध्यस्थित हो शृगालसे कहा-“भो भानूजे ! देख २ बड़ी निर्मल रात्रि है । सो मैं गीत करता हूं । सो कह कौनसे राग (स्वर) से गाऊं ?” । वह बोला,—“मामा ! इन अन- र्थके व्यापारसे क्या है ? क्यों कि चौरकर्ममें प्रवृत्त हुए हम दोनो हैं । इस ससारमें चोर जारोंको मौन रहना चाहिये । कहा है- कासयुक्तस्त्यजेच्चौर्यं निद्रालुश्चैत्स चौरिकाम् । जिह्वालौल्यं रुजाक्रान्तो जीवितं योऽत्र वाञ्छति ॥५३॥ खांसीवाला चोरी न करे, बहुत सोनेवाला चोरीकी वृत्तिको त्यागन करे, रोगी जिह्वाका स्वाद त्यागदे, जो जीवनकी इच्छा करे तो ॥ ५३ ॥ अपरं त्वदीयं गीतं न मधुरस्वरं शंखशब्दानुकारं दूरा- दपि श्रूयते । तदत्र क्षेत्रे रक्षापुरुषाः सन्ति । ते उत्थाय वधं बन्धं वा करिष्यन्ति । तद्भक्षय तावत् अमृतमंयाः चिर्भटीः । मा त्वम् अत्र गीतव्यापारपरो भव” । तत् श्रुत्वा रासभ आह,—“भो ! वनाश्रयत्वात् त्वं गीतरसं न वेत्सि । तेन एत- द्ब्रवीषि । उक्तञ्च- फिर तेरा गीतभी मधुर स्वरका नहीं है शंखके शब्दकी समान दूरसे भी सुना जाता है । और इस खेतमें रक्षा पुरुष हैं । वे उठकर वध वा बंधन करेंगे सो अमृतमय ककड़ी खाओ । इस समय तुम गीतका व्यापार मतकरो” । यह सुनकर गधा बोला,—“भो ! वनवासी होनेसे तू गीतरसको नहीं जानता है इससे ऐसा कहता है । कहा है-