पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४८८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भीष्टं किञ्चित् । रक्षैनं पादपम्" इति । कौलिक आह- "यदि एवं तदहं स्वगृहं गत्वा स्वमित्रं स्वभार्याञ्च पृष्ट्वा आगमि- ष्यामि । ततः त्वया देयम्" । अथ "तथा" इति प्रतिज्ञाते व्यन्तरेण स कौलिकः प्रहृष्टः स्वगृहं प्रति निवृत्तः । यावत अग्रे गच्छति तावत् ग्रामप्रवेशे निजसुहृदं नापितम् अपश्यत्। ततस्तस्य व्यन्तरवाक्यं निवेदयामास । "यदहो मित्र ! मम कश्चित् व्यन्तरः सिद्धः तत्कथय किं प्रार्थये ? । अहं त्वां प्रष्टुम् आगतः" । नापित आह- "भद्र ! यदि एवं तत् राज्यं प्रार्थय येन त्वं राजा भवसि अहं त्वन्मन्त्री च । द्वौ अपि इह सुखमनुभूय परलोकसुखम् अनुभवावः । उक्तञ्च- किसी स्थानमें मन्थरक नाम कौलिक रहता था । किसी समय वस्त्र कार्य करते हुए उसके संपूर्ण कपडे बुननेके कर्मकाष्ठ ( तुरीवेमादि ) भग्न होगये । तब वह कुल्हाडी लेकर वनमे काठके निमित्त गया । वह जबतक घूमता समुद्रके किनारे गया, तब वहां उसने सीसोंका एक वृक्ष देखा । तब विचारने लगा। "यह बडा वृक्ष दिखता है । सो इसके काटनेसे अनेक पट्ट निर्माणकी वस्तु हो जायगी ऐसा विचार उसपर कुठाराघात किया । उस वृक्षमें कोई व्यन्तर (पक्षी विशेष) रहता था । उसने कहा- "भो ! यह वृक्ष मेरे रहनेका स्थान है । सब प्रकार रक्षा करना चाहिये । क्योकि मै यहां महासुखसे रहता हूं, समुद्रकी लहरोंके स्पर्शसे शीत वायुसे प्रसन्न हुआ रहता हूं" । कौलिकने कहा- "भो ! मैं क्या करूं ? काठके विना मेरा कुटुम्ब भूखसे पीडित है । इस कारण शीघ्र और स्थानमें जाओ । मैं इसे काटूंगा" । व्यन्तर बोला,- "भो ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हू, सो कुछ अभीष्ट वर मांगो । इस वृक्षको रहने दो" । कौलिक बोला "जो ऐसा है तो मैं अपने घर जाकर अपनी मित्र भार्यासे पूछ आऊं तब तुम देना" । तब "बहुत अच्छा" यह व्यन्तरसे प्रतिज्ञा करके वह कौलिक प्रसन्न हो अपने घरकी ओर चला । जबतक आगे जाता है तबतक ग्राममें प्रवेशकर निजमित्र नाईको देखा । तब उसने उससे व्यन्तरका वाक्य निवेदन किया । कि,- "अहो मित्र ! मुझे व्यन्तर सिद्ध हे कहो क्या मांगू ? । मैं तुझसे पूछ- नेको आया हूं" । नाई बोला,- "भद्र ! जो ऐसा है तो राज्यकी प्रार्थना कर। जिससे तू राजा हो और मैं तेरा मन्त्री, दोनोंही यहां सुख अनुभवकर पर- लोकका सुख प्राप्त करें कहा है-