पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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[Body] उत्पन्न होंगे उनके बेचनेसे बहुतसा सोना प्राप्त होगा, उससे चतुःशाला घर बनाऊंगा तब कोई ब्राह्मण मेरे घरमें आकर वयस युक्त मनोहर कन्या देगा । उसके द्वारा मेरे पुत्र होगा । उसका मैं सोमशर्मा नामकरण करूंगा । फिर उसके जांघोंसे चलने योग्य होनेमें पुस्तक ग्रहणकर अश्वशालाके पीछे बैठा हुआ उसका ध्यान करूंगा । इसी समय सोमशर्मा मुझे देखकर, माताकी गोदसे घुटनोंसे चलता हुआ घोडेके खुरके समीपवर्ती होकर मेरे निकट आवेगा । तब मैं ब्राह्मणीसे क्रोध कर कहूंगा । बालकको ग्रहणकर । वहभी घरके कार्यमे व्यग्र हुई मेरा वचन न सुनेगी तो मैं उठकर उसे पाद प्रहारसे ताड़न करूंगा।"। इस प्रकारसे ध्यानमे स्थित हुए उसने ज्योंही लात मारी त्योंही वह घडा टूटा और सत्तूओके बिखरने से श्वेतताको प्राप्त हुआ । इससे मैं कहता हूं- अनागतवतीं चिन्तामसम्भाव्यां करोति यः। स एव पाण्डुरः शेते सोमशर्मपिता यथा ॥ ७३ ॥" जो नहीं आई हुई और असम्भाव्य चिन्ताको करता है वह सोमशर्मा ब्रह्म- णके पिताकी समान श्वेत हो सोता है ॥ ७३ ॥ सुवर्णसिद्धिः आह-"एवमेतत् । कस्ते दोषो ? यतः सर्वो- ऽपि लोभेन विडंबितो बाध्यते । उक्तञ्च- सुवर्णसिद्धिने कहा-"ऐसेही है तेरा दोष क्या है ? सब लोभसे वंचितहो पीडित होतेहैं । कहा है- यो लौल्यात्कुरुते कर्म नैवोदर्कमवेक्षते । विडम्बनामवाप्नोति स यथा चन्द्रभूपतिः ॥ ७४ ॥" जो चपलतासे कर्म करता है और उसका परिणाम नहीं सोचता है वह चन्द्रराजाकी समान विडम्बनाको प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥" चक्रधर आह,-"कथमेतत् ?" आह । चक्रधर बोला-"यह कैसे ?" वह बोला- : कथा १०. : कस्मिंश्चित् नगरे चन्द्रो नाम भूपतिः प्रतिवसति स्म, तस्य पुत्रा वानरक्रीडारता वानरयूथं नित्यमेव अनेकभोजन-