भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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(५०८) पञ्चतन्त्रम् । कथा १२. अस्ति उत्तरापथे मधुपुरं नाम नगरम् । तत्र मधुसेनो नाम राजा बभूव । तस्य कदाचित् विषयसुखम् अनुभवतः त्रिस्तनी कन्या बभूव । अथ तां त्रिस्तनीं जातां श्रुत्वा स राजा कञ्चुकिनः प्रोवाच,-"यद भोः त्यज्यतामियं त्रिस्तनी गत्वा दूरेऽरण्ये यथा कश्चित् न जानाति"। तच्छ्रुत्वा कञ्चुकिनः प्रोचुः,- "महाराज ! ज्ञायते यत अनिष्टकारिणी त्रिस्तनी कन्या भवति । तथापि ब्राह्मणा आहूय प्रष्टव्या येन लोकद्वयं न विरुद्ध्यते । यतः- उत्तर दिशामें एक मधुपुर नाम नगर है। वहां मधुसेन नामवाला राजाथा। उसको कभी विषयसुख अनुभव करते तीन स्तनवाली कन्या हुई। उसको तीन स्तनवाली हुई सुनकर राजा कंचुकीसे बोला,-"भो ! इस तीन स्तनीको दूर वनमें जाकर त्याग दा जो कोई भी इसको न जाने"। यह सुन कुंचकी बोले,-"महाराज ! यह जाना तो है कि, तीन स्तनी कन्या अनिष्टकारिणी होती है। तो भी ब्राह्मणोंको बुलाकर बूझाजाय, जिससे दोनों लोक न बिगडें। क्योंकि- यः सततं परिपृच्छति शृणोति सन्धारयत्यनिशम् । तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विवर्द्धते बुद्धिः ॥ ९३ ॥ जो सदा पूछता, सुनता, रातदिन धारण करता है उसकी बुद्धि सूर्यकी किरणोंसे कमलिनीकी समान बढती है ॥ ९३ ॥ तथाच- और देखो- पृच्छकेन सदा भाव्यं पुरुषेण विजानता । राक्षसेन्द्रगृहीतोऽपि प्रश्नान्मुक्तो द्विजः पुरा ॥ ९४ ॥ " विज्ञ पुरुषकोभी प्रश्न करना चाहिये, राक्षसेन्द्रसे गृहीत हुआ कोई पुरुष पहले प्रश्नसेही मुक्त हुआ था ॥ ९४ ॥" राजा आह-"कथमेतत् ?" ते प्रोचुः- राजा बोला,-"यह कैसे ?" वे बोले-