भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (५०९) कथा १३. देव ! कस्मिंश्चित् वनोद्देशे चण्डकर्मा नाम राक्षसः प्रति- वसति स्म, एकदा तेन भ्रमता अटव्यां कश्चिद् ब्राह्मणः समासादितः । ततः तस्य स्कन्धमारुह्य प्रोवाच,-"भो ! अग्रेसरो गम्यताम् । ब्राह्मणोऽपि भयत्रस्तमनाः तमादाय प्रस्थितः । अथ तस्य कमलोदरकोमलौ पादौ दृष्ट्वा ब्राह्मणो राक्षसम् अपृच्छत्-"भोः ! किमेवं विधौ ते पादौ अतिको- मलौ ?'' । राक्षस आह-"भो ! व्रतमस्ति, नाहम् आर्द्र- पादो भूमि स्पृशामि" । ततः तच्छ्रुत्वा आत्मनो मोक्षोपायं चिन्तयन् सरः प्राप्तः । ततो राक्षसेन अभिहितम्,-"भो ! यावदहं स्नानं कृत्वा देवतार्च्चनविधिं विधाय आगच्छामि तावत् त्वया अतः स्थानात् अन्यत्र न गन्तव्यम्" । तथानु- ष्ठिते द्विजः चिन्तयामास । "नूनं देवतार्चनविधेरूर्ध्व मामेष भक्षयिष्यति । तत् द्रुततरं गच्छामि येन एष आर्द्रपादो न मम पृष्ठम् एष्यात" । तथानुष्ठिते राक्षसो व्रतभङ्गभयात् तस्य पृष्ठ न गतः । अतोऽह ब्रवीमि- देव ! किसी वनके निकट चण्डकर्मा नाम राक्षस रहता था । एक समय रात्रिको वनमें भ्रमण करते उसे कोई ब्राह्मण मिला । तब उसके कंधेपर चढकर बोला,-"भो ! आगे होकर चलो" । ब्राह्मणभी भय व्याकुल मनसे उसे लेकर चला तब उससे कमलके मध्यभागकी समान चरणोंको कोमल देख कर ब्राह्मण राक्षससे पूछने लगा--"भो ! इस प्रकार आपके चरण कोमल क्यों है ?" राक्षस बोला,-"भो ! यह मेरा व्रत है कि, गीले पाव मैं पृथ्वीको स्पर्श नहीं करता हूँ"। यह सुनकर अपने छूटनेके उपायको विचारता हुआ वह सरोवरको प्राप्त हुआ । तब राक्षसने कहा,-"भो ! जबतक मैं स्नानकर देवतार्चन विधि करके आऊ तबतक तुम इस स्थानसे ओर कहीं न जाना"। ऐसा करने पर ब्राह्मण विचारने लगा-"अवश्यही देवार्चन विधिके उपरान्त यह मुझको खा जायगा । सा शीघ्रतासे जाऊ जिससे यह गीले चरण होनेके कारण मेरे पीछे न आ सकेगा"। ऐसा करनेपर राक्षस व्रतभंगके डरसे उसके पीछे गया । इससे मैं कहता हू-