पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ॰ ( ६१) , यच्च मां संसारसागरोत्तरणोपायं पृच्छसि तच्छ्रूयताम् । और जो मुझसे संसारसागरसे पार होनेका उपाय पूछताहै, तो सुन— शूद्रो वा यदि वान्योऽपि चण्डालोऽपि जटाधरः । दीक्षितः शिवमन्त्रेण स भस्माङ्गी शिवो भवेत् ॥ १७८ ॥ शूद्र अथवा कोई अन्य चाण्डाल वा जटाधारी कोईहो शिवमन्त्रस दीक्षित हो शरीरमें भस्म लगानेसे शिव होजाताहै ॥ १७८ ॥ षडक्षरेण मन्त्रेण पुष्पमेकमपि स्वयम् । लिंगस्य मूर्ध्नि यो दद्यान्न स भूयोऽभिजायते ॥ १७९ ॥ जो षडक्षरमंत्रसे एकभी फूल शिवलिंगपर चढाताहै उसका फिर जन्म नहीं होताहै ॥ १७९ ॥ तच्छ्रुत्वा आषाढभूतिस्तत्पादौ गृहीत्वा सप्रश्रयमिदमाह- "भगवन् ! तर्हि दीक्षया मे अनुग्रहं कुरु" । देवशर्मा आह- "वत्स ! अनुग्रहं ते करिष्यामि परन्तु रात्रौ त्वया मठमध्ये न प्रवेष्टव्यं यत्कारणं निःसङ्गता यतीनां प्रशस्यते तव च ममापि, च । उक्तञ्च- यह सुन आषाढभूति उसके चरणोंको ग्रहणकर आदरसे यह बोला-“भग- वन् ! तो दीक्षा कर मेरे ऊपर अनुग्रहकरो"। देवशर्मा बोला-“वत्स ! तेरे ऊपर मैं अनुग्रह करूंगा, परन्तु रात्रिमें तू मठमे प्रवेश न करना कारण यह है कि, यतियोंकी निस्संगताही प्रशंसनीयहै सो तुम्हारी और मेरीभी । कहाहै- दुर्मन्त्रान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गात्सुतो लालनाद् विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् । मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात्स्नेहः प्रवासाश्रयात् स्त्री गर्वादनवेक्षणादपि कृषिस्त्यागात्प्रमादाद्धनम् ॥१८०॥ दुर्मन्त्रसे राजा नष्ट होता है, संगसे यति, लाडसे पुत्र, न पढनेसे ब्राह्मण, कुपुत्रसे कुल, दुष्टोंके संगसे शील, अप्रणयसे मित्रता, अनयसे समृद्धि, परदेशमें रहनेसे स्नेह, गर्वसे स्त्री, न देखनेसे खेती, त्याग और प्रमादसे धन नष्ट- होताहै ॥ १८० ॥