पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ७३ ) संदेहोंका आवर्त ( भौर ), अविनयका घर, साहसका पत्तन ( नगर ), दोषोंका स्थान, कपटका शतगृह, अविश्वासका क्षेत्र, बडे नरपुरुषोंसे ग्रहण करनेको असमर्थ, सब मायाकी पोटली स्त्रीरूपी यन्त्र जो विष और अमृतसे युक्त है सो धर्म नाशके लिये किसने निर्माण की है ? ॥ २०१ ॥ कार्कश्यं स्तनयोर्हशोस्तरलतालीकं मुखे दृश्यते कौटिल्यं कचसञ्चये प्रवचने मान्द्यान्त्रिके स्थूलता । भीरुत्वं हृदये सदैव कथितं मायाप्रयोगः प्रिये यासां दोषगणो गुणा मृगदृशां ताः किं नराणां प्रियाः२०२ स्तनोंमें कठिनता, नेत्रोंमें चंचलता, मुखमें असत्य, बालसमूहमें कुटिलता, वचनमें मधुरता, नितम्बोंमें स्थूलता, हृदयमें भय, स्वामीमें मायापूर्वक वचनोंका कहना, इस प्रकारके जिनके दोष गुणनामसे ग्रहण किये जाते हैं, क्या वह मनुष्योंकी प्रिया हैं ? अर्थात् नहीं हैं ॥ २०२ ॥ एता हसन्ति च रुदन्ति च कार्यहेतो- र्विश्वासयन्ति च परं न च विश्वसन्ति । तस्मान्नरेण कुलशीलवता सदैव नार्य्यः श्मशानवटिका इव वर्जनीयाः ॥ २०३ ॥ यह कार्यके निमित्त हँसती और रोती हैं, विश्वास करकेभी यह विश्वासको प्राप्त नहीं होती हैं इसकारण कुलशीलवाले मनुष्यको श्मशानके वटवृक्षकी समान सदा स्त्रियें वर्जनीय हैं ॥ २०३ ॥ व्याकीर्णकेशरकरालमुखा मृगेन्द्रा नागाश्च भूरिमदराजिविराजमानाः । मेधाविनश्च पुरुषाः समरेषु शूराः स्त्रीसन्निधौ परमकापुरुषा भवन्ति ॥ २०४ ॥ बिखरे हुए गरदनके बालोंसे करालमुखसिंह, अत्यन्त मदसमूहसे विराज- मानहाथी तथा बुद्धिमान् समरशूर, पुरुष भी स्त्रीके निकट परम कायर होजाते हैं ॥ २०४ ॥ कुर्वन्ति तावत्प्रथमं प्रियाणि यावन्न जानन्ति नरं प्रसक्तम् ।