पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७ ) पञ्चतन्त्रम् । ज्ञात्वा च तं मन्मथपाशबद्धं ग्रस्तामिषं मीनमिवोद्धरन्ति ॥ २०५ ॥ जबतक यह मनुष्यको प्रसक्त नहीं जानती तबतक प्रिय करतीहैं और पीछे उसे कामके वशीभूत जानकर मांस ग्रहण करनेवाली मछलीकी समान उठा- लेती हैं ॥ २०५ ॥ समुद्रवीचीव चलस्वभावाः सन्ध्याभ्ररेखेव मुहूर्त्तरागाः । स्त्रियः कृतार्थाः पुरुषं निरर्थ निष्पीडितालक्तकवत्त्यजन्ति ॥ २०६ ॥ समुद्रकी तरंगोंकी समान चंचल स्वभाव संध्याकालके मेघरेखाकी समान मुंहूर्तमात्रको रागवाली स्त्रिये सिद्धकाम होकर निर्धन पुरुषको निचोडे महावरकी समान त्याग देती हैं ॥ २०६ ॥ अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता । अशौचं निर्दयत्वञ्च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ २०७ ॥ झूठ, साहस, माया, मूर्खत्व, अतिलोभ, अपवित्रता, निर्दयता यह स्त्रियोंके स्वाभाविक दोषहैं ॥ २०७ ॥ सम्मोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति । एताः प्रविश्य सरलं हृदयं नराणां किं वा न वामनयना न समाचरन्ति ॥ २०८ ॥ मोहित करती, मदकरती, प्रसन्न करती, वंचित करती, घुडकती, रमती और विषादित करती हैं, बहुत क्या यह कुटिल नेत्रवाली पुरुषोंके सरल हृदयोंमें प्रवेश करके क्या क्या नहीं करती हैं ॥ २०८ ॥ अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः । गुञ्जाफलसमाकारा योषितः केन निर्मिताः ॥ २०९ ॥” यह भीतरसे विषमयं और बाहरसे मनोरम, चोंटलीके फलकी समान स्त्रियें किसने निर्मित की हैं ? ॥ २०९ ॥” एवं चिन्तयतस्तस्य परिव्राजकस्य सा निशा महता कृच्छ्रेण अतिचक्राम। सा च दूतिका छिन्ननासिका स्वगृहं गत्वा